ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
साहित्य नंदिनी आवरण पृष्ठ 3 (चर्चा के बहाने)
September 11, 2020 • रेनू यादव • साहित्य नंदनी

चर्चा के बहाने

रेनू यादव

फेकल्टी असोसिएट

भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय,

यमुना एक्सप्रेस-वे, गौतम बुद्ध नगर,

ग्रेटर नोएडा – 201 312

ई-मेल- renuyadav0584@gmail.com

 

फिल्म - Rough Book (2016)
लेखक - संजय चैहान, अनंत नारायण महादेवन
निर्देशक - अनंत नारायण महादेवन
नायक - तनीशा चटर्जी, मुकेश हरियावाला, अमान एफ. ख़ान
प्रोडक्शन - एन आकाश चैधरी प्रोडक्शन

‘‘आई फेल्ड यू एज ए टीचर, तुम्हें हारना नहीं सिखा पायी’’ ।

लघु फिल्म रफबुक में नायिका संतोषी की माँ का संतोषी से संवाद है । यह सिर्फ एक संवाद नहीं बल्कि जीवन का वह सत्य है जिसे कोई भी माँ अपने बच्चे को शायद ही सिखाती हो ! जीतना तो हर कोई सिखाता है लेकिन हारना..?

जीवन में जीतने के लिए हारना सीखना और हार को सकारात्मक रूप से स्वीकृत्ति देने की सीख अतिआवश्यक है । जो हारना नहीं जानता, उसे जीतने का पूर्ण अनुभव, पूर्ण खुशी प्राप्त नहीं होती । हजार गलतियों के बाद भी जीतने के लिए बार बार हार कर आगे बढ़ते जाना ही जीवन है । आज के समय में यह सभी को, खासकर छात्रों को सीखने की जरूरत है । इस फिल्म में नायिका की माँ कहती है, ”कोशिश करो, हन्ड्रेड परसेन्ट, और अगर फेल भी हो गई तो हम सेलिब्रेट करेंगे“ ।  

यदि हर माँ-बाप अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देते तो शायद कोई छात्र असफल होने के डर से या असफलता के पश्चात् आत्महत्या नहीं करता । भारत में छात्रों की बढ़ती आत्महत्या की दर देखते हुए आज के समय में शिक्षा व्यवस्था में जो परिस्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं उसमें छात्रों को जीतने के हौसला के साथ-साथ हार को एक चुनौति मानकर आगे बढ़ने की सीख देनी होगी, अन्यथा यदि देश का भविष्य आत्महत्या करने से बच भी जाता है तो निराशा-भग्नाशा का शिकार रहेगा ।

यदि किसी भी देश को बरबाद करना हो, तो सबसे पहले वहाँ की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करो । जब आम जनता का दिमाग पंगू होगा तो लोग आश्रीत पिछलग्गू बनकर आपके काले कारनामों में आपका साथ देंगे । उन्हें लम्बे लम्बे भाषणों के जाल में फंसाकर अंधा, गूंगा, बहरा बनाना होगा ताकि वे सोचने समझने देखने में असमर्थ हो जायें और फिर उनके हाथों में रोजगार के नाम पर कटोरा और बांसूरी थमाने की बात की जाये, जैसा कि कुछ महिने पहले एक विश्वविद्यालय के कुलपति ने अपने भाषण में कटोरा लेकर ट्रेन में भीख माँगने को रोजगार का नाम दिया था ! 

यदि यही रोजगार है, तो समझ सकते हैं कि देश में विकास किस स्तर तक विकास कर सकेगा और युवा वर्ग शिक्षा की छद्मी राजनीति के जाल में फंसकर किस हद तक फदफदाता रहेगा ? वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए प्रमुख दो तरिके दिखाई दे रहे हैं- पहला, शिक्षण संस्थानों में अलग-अलग तरिके से टारगेट कर छात्रों को देशद्रोही साबित कर दिया जाय औरे दूसरा, शिक्षण संस्थानों का नीजिकरण कर उनकी फीस में इतनी बढ़ोत्तरी कर दिया जाय कि आम जनता शिक्षा से वंचित रह जाये ।  

शिक्षण संस्थान पहले से ही शिक्षकों के अभाव में दमा के बीमारी से फूल-पचक रहा था, अब नीजिकरण के कारण मनमाने तरिके से शिक्षकों को डिमाण्ड एवं सप्लाई की नीति के तरह स्वार्थ सिद्धी करना तथा चमचमाते स्कूल के चमचमाते ड्रेस कोड के बीच मरती आत्माओं की चीख को प्राइवेट ट्यूशन के नीचे दबा देना बेहद आसान हो गया है और होता जा रहा है । सच तो यही है कि चाहे जितना भी शिक्षा नीतियों में बदलाव किया जाय, जब तक शिक्षा को स्वार्थ सिद्धी हेतु राजनीतिकरण एवं उसका व्यावसायीकरण किया जाता रहेगा तब तक शिक्षा का स्तर नीचे गिरता रहेगा । इस छोटी सी फिल्म में नायिका संतोषी पाठ्यक्रमों को पूरा करने के दबाव पर कहती है,"हम लोग टीचर्स हैं, सेल्समैन नहीं जिन्हें अपना टारगेट पूरा करना है ।"

इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों को सेल्समैन बनने के लिए बाध्य किया जाता है । निःसंदेह समय से पाठ्यक्रम पूरा करना एक अच्छे शिक्षक की निशानी है, लेकिन शिक्षा ग्राह्य होना न होना ये शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी से बाहर होता जा रहा है , अपने नीजि हितों तथा बेहतर रिजल्ट दिखाने के चक्कर में छात्रों को पास करने के लिए शिक्षकों पर अलग-अलग तरिके से दबाव बनाना उन्होंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी बना ली है । इस प्रक्रिया में छात्रों का हित-अहित उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखता । शिक्षण संस्थानों का नीजिकरण, शिक्षकों का अभाव, पाठ्यक्रम तथा फीस की संरचना तथा रोजगार के प्रति बदलता नजरिया संबंधि बाध्यता चाहे सरकार द्वारा जारी हो अथवा प्रशासन द्वारा अथवा शिक्षक के स्वयं की नौकरी में असुरक्षा की भावना ? ये सभी कारक न सिर्फ युवा वर्ग को बल्कि देश के भविष्य को भी अंधेरे में रख रहे होते हैं । आज युवा वर्ग शिक्षा, व्यवसाय और खुद अपने जीवन के मामले में भी अंधकार से जूझ रहा हैं, रोशनी की चाह में तड़फड़ा रहा है । ऐसे में शिक्षा के लिए आवाज उठाती इस फिल्म का यह डायलॉग छात्रों की हौसला बढ़ाने में सहायता प्रदान कर सकता है -

“जुगनू की लाइफ सिर्फ कुछ दिनों की होती है, रुकते नहीं है कि प्रत्येक रात को जगमगा न सकें । (A Firefly only lives for a few days. But that doesn't stop them from illuminating every night)"