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सही निर्णय
November 15, 2020 • Alok Misra • बिरासत


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अभी मैं सोने के लिए लेटा ही था कि फ़ोन की घंटी बजी । राकेश का फ़ोन था रायबरेली से । राकेश की बेटी निहारिका की सगाई कुछ महीने पहले हुई थी और अब शादी की तारीख़ पास आ रही थी । शादी की तैयारी के सिलसिले में राकेश से आजकल लगातार फ़ोन पर बात होती रहती थी । लेकिन याद नहीं पड़ता इतनी देर रात में उसने कभी फ़ोन किया हो । मैं असमंजस में पड़ गया कि इतनी देर रात फ़ोन करने के पीछे क्या बात हो सकती है।

निहारिका के होने वाले पति और सास-ससुर से सगाई के दौरान मुलाकात हुई थी । निहारिका और गौरव की जोड़ी बहुत ही अच्छी लग रही थी बिलकुल रनवीर और दीपिका जैसी । सास-ससुर भी बहुत भले और सज्जन लगे थे । राकेश, भाभी जी निहारिका सभी इस रिश्ते से बहुत खुश लग रहे थे । गौरव के पिता दूर के रिश्ते से राकेश के सम्बंधी थे । यही सोचकर राकेश निश्चिन्त था कि निहारिका जानेपहचाने परिवार में जाएगी, और खुश रहेगी ।

शादी की तैयारियाँ ज़ोरों से चल रही थीं । शादी के मंडप का इंतज़ाम, सजावट, बारातियों के ठहरने की व्यवस्था, खाने का मेन, ख़ास मेहमानों के लिए उपहार, फोटोग्राफर, मेकअप वाले और बहुत कुछ । निहारिका राकेश की अकेली बेटी थी इसलिए वह बेटी की शादी में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था ।

मैंने फ़ोन उठाया “हाँ राकेश, कैसा चल रहा है सब इंतज़ाम" "सुनील, एक बात बतानी थी तुझे" राकेश ने कहा “हाँ कहो, यार सब ठीक तो है ना” राकेश का ऐसे औपचारिक रूप से बात करना मुझे अटपटा सा लग रहा था ।

“सगाई से पहले जब मैंने गौरव के पिता से लेन-देन के बारे में उनकी राय जाननी चाही थी तब उन्होंने साफ़ कहा था कि उन्हें दहेज बिलकुल नहीं चाहिए । उन्होंने कहा था कि “निहारिका जैसी सुन्दर और सुशील बहू पाकर हम सभी बहुत प्रसन्न हैं ।” राकेश ने कहा-

“हाँ, यह बात तो तुमने मुझे भी बताई थी । दहेज़ के लेन-देन के खिलाफ़ निहारिका के होने वाले ससुर के विचार सुनकर मैं भी बहुत प्रसन्न हुआ था" मैं राकेश की बात का अभिप्राय समझने की कोशिश कर रहा था ।

"दहेज के बारे में उनके ऐसे विचार जानकर मैं भी बहुत खुश था । लेकिन कुछ दिन पहले उन्होंने अपने एक रिश्तेदार को एक सूची देकर हमारे घर भेजा था । साथ ही कहलवाया कि सूची में दर्ज़ चीजें विदाई से पहले ही भिजवा दें।”

"मैंने निहारिका के होने वाले ससुर को फ़ोन करके उनसे सूची के बारे में और सन्देश वाहक द्वारा कही बात की पुष्टि करनी चाही । साथ ही यह भी याद दिलाया कि सगाई से पहले तो उन्होंने दहेज लेने से साफ़ मना कर दिया था । इस पर वह कहने लगे कि सूची में तो कुछ मामूली चीजें ही लिखी हैं । मुझे तो कुछ नहीं चाहिए लेकिन गौरव की माँ का कहना है कि रीति-रिवाज़ तो निभाना ही चाहिए । वरना रिश्तेदार और पड़ोसी क्या कहेंगे कि किन लोगों के यहाँ शादी कर दी "

“यह तो बड़ा अजीब व्यवहार है उनका” जो कुछ राकेश ने अभी बताया था मैं उस पर विश्वास नहीं कर पा रहा था ।

राकेश ने कहा “मैंने तो उन चीज़ों को खरीदने के इंतज़ाम भी कर लिये थे । यही सोचकर कि एक ही बेटी है मेरी और मेरा सब कुछ उसी का तो है - आज या कल"

"लेकिन फिर उनकी मांग का सिलसिला बढ़ने लगा - कार का मॉडल नम्बर, सोने के गहने का वज़न, नगद रूपया, घर का सामान वगैरह ।”

"मुझे लगने लगा कि उनकी मांग का सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होगा । बल्कि सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता ही जाएगा । हो सकता है शादी के बाद भी यह लोग मांग का सिलसिला जारी रखें और उसके लिए निहारिका को भी तंग करें ।”

“हूँ" मैं विचारों में उलझा हुआ बस इतना ही कह पाया । मैं सोच रहा था कि दहेज़ लेना कानूनन जुर्म है और देश के हर नागरिक को यह बात पता होनी चाहिए । मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि आज भी पढ़े-लिखे लोग दहेज़ की लालसा रखते हैं ।

"सुनील, बहुत सोच-विचार करने के बाद मैंने निहारिका की शादी का रिश्ता तोड़ दिया है" राकेश ने बहुत ही संयत होकर कहा । राकेश की बात सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया । अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था । जो कुछ मैंने अभी-अभी सुना, क्या वह सच था? इस निर्णय पर पहुंचने से पहले राकेश को कितने अंतर्द्वद का सामना करना पड़ा होगा । कितनी बातों पर विचार लिया होगा - लोग क्या कहेंगे, निहारिका लोगों के कटाक्ष का सामना कर सकेगी?

"मैंने ठीक किया ना, सुनील?" राकेश ने जानना चाहा ।

“राकेश, तुमने बहुत सही निर्णय लिया है । तुम्हारे इस निर्णय से आज सभी को थोड़ी परेशानी ज़रूर होगी, लेकिन निहारिका की खुशी के लिए यह बहुत ही अच्छा निर्णय है । उसे दहेज के लोभी के साथ ज़िन्दगी तो नहीं बितानी पड़ेगी ।"

मुझे महसूस हो रहा था राकेश की आँखों में जीत की चमक थी । उसने अपनी बेटी को धन के लालचियों के चंगुल से बचा लिया था ।