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समय की धारा
February 6, 2020 • रीता जैन • कविताएँ

समय की धारा में बहता चला गया,

किनारा मिला तो वहीं ठहर गया

सांसें कम पड़ने लगीं थीं, हम भागे जा रहे थे

दिशाहीन तो नहीं हो गए, सोचने पर मजबूर हो गए थे

 

क्यों इधर उधर झांकता है, पीछे मुड़कर देखता है

कोई हमराही नहीं, सिर्फ समय तेरे साथ है

भेडचाल से सपने साकार नहीं होते।

मैं मुझमें पर्याप्त हूं, बुलंदियां वही छू पाते

रास्ते तो बहुत हैं, नया बनाना आसान नहीं

औरों के पदचिन्हों पर चलना, ऐसी तो मजबूरी नहीं।

 

अकेले ही आए, अकेले ही जाना है

फिर इस होड़ में कैसे फिसल गए हम

जो कंधे से कंधा मिलाकर चल न सके

चार कंधों की आस में, जीवन व्यर्थ करते हम।

 

गिर कर उठना और फिर गिर जाना, आत्मबल पनपता है

खुद का खुद से परिचय हो गया, नया जीवन खिलता है

सफर लंबा है, जीने की कला मिल गई

अब डर कैसा, कैसी चिंता

एक द्वार बंद हुआ तो दूसरा भी खुलता है।

 

समय अपनी लय से अपनी चाल चलता है

वह निरंतर समान है, वक़्त बदलता है

इतिहास गवाह है, समय से आगे कोई दौड़ न सका

जो पीछे रह गया, वो यूहीं भटकता रहा

वक़्त का क्या है, कभी ऊपर कभी नीचे

जिसकी लय से लय मिल गई, वो फिर कभी नहीं गिरते।

रीता जैन, अध्यक्ष अभिव्यक्ति, नई दिल्ली