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समीक्षा
April 1, 2020 • काकोली गोराई • साहित्य नंदनी

समी. काकोली गोराई, सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, जामताड़ा कॉलेज, जामताड़ा, झारखंड, मो. 

कृति: मैं तेरा अधूरा खत हूँ....
लेखक: विजय चौहान
विधा: काव्य-संग्रह
मूल्य: 140 रूपये
प्रकाशक: अरूण पब्लिशिंग हाऊस प्राईवेट लिमिटेड, सैक्टर-17ब्एचण्डीगढ़

 

मैं तेरा अधूरा खत हूँ....


विजय चैहान की कविताई से रूबरू होने का अवसर मुझे उनकी कविता संग्रह ‘मैं तेरा अधूरा खत हूँ....’ के प्रकाशन पर हुआ। प्रेम को केन्द्र रखकर इस संग्रह में कविताऐं है, जिनमें भाव, भाषा और शैली की सुंदर त्रिवेणी में जब सरल, सहज विषय गोते लगाती है, तो वह पाठक के मानस पटल पर अपनी चित्र ही अंकित नहीं करती, अपितु हृदय की गहराईयों में बैठ जाती है।
प्रेम और सौन्दर्य की भावनाओं का मानव जीवन में 
सर्वाधिक महत्व है। विजय जी ने प्रेम को जीवन के एक शाश्वत सत्य के रूप में स्वीकार किया है। उन्होंने प्रेम के महत्व को अनेकानेक रूपों में चित्रित किया है, जैसे-
रोज तेरा नाम लेता हूँ /जीने का खुबसूरत बहाना करके।
वस्तुतः विजय जी प्रेम को सत्य और आदर्श के रूप में स्वीकार करते हैं। प्रेम, सौन्दर्य, रूप-यौवन इनके काव्य के मुख्य विषय हैं। कवि की यह विशेषता है कि, उन्होंने गहन से गहन विषय को भी बड़ी सहजता से अभिव्यक्त किया है। उनके गीतों में प्रणयमूलक प्रेम के दोनों पक्ष, मिलन और विरह बहुत ही सहजता एवं मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। मिलन की स्थिति में कवि का भाव देखिए-  
एक लड़की है, सबसे अच्छी/उसकी मुस्कान, फूलों से अच्छी / उसके होंठ, बुदें /शबनम की / उसकी बातें, शहद से मिठी / उसके गाल, पंखुडियां गुलाब की / उसकी  आंखें, गहराई सागर की।   
लेकिन विरह की स्थिति में कवि कुछ इस तरह लिखता है-
मैं तुम्हें, पा नहीं सका, तो क्या हुआ / मेरे दिल में, आज भी, हमारा घर है।  
इस काव्य संग्रह की विशेषता है, कि कवि पग-पग पर अपनी संगिनी के प्रति आभार व्यक्त करते है-
तुम चाहो नहीं, बस महसुस करो / मैं बहता हूँ, तुम्हारी सांसों में, एक उम्मीद बन कर।
कुल मिलाकर कहा जाए तो इस संग्रह की कविताओं में मुख्य रूप से प्रेम का स्वर है, लेकिन इन कविताओं में प्रेम दैहिक स्तर पर न होकर आत्मिक स्तर पर है। इस संग्रह की कविताओं में प्रेम कई रूपों में कई बार आता है, लेकिन हर बार उसका अर्थ सिर्फ और सिर्फ प्रेम होता है। एक बात और कि इन कविताओं का प्रभाव समाज को स्वस्थ दृष्टि देने में पूर्ण सफल है, अतः यह पुस्तक स्वागत योग्य है तथा पुस्तक की साज-सज्जा को चार चाँद लगाते हैं। पुस्तक मुद्रण दोष से मुक्त है। मुझे आशा है, कि पाठक इस पुस्तक को अवश्य पढ़ेंगे। गीतकार  विजय चैहान को इस पुस्तक के प्रकाशन पर बधाई देती हूँ।