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समीक्षा
April 1, 2020 • नीलोत्पल रमेश • साहित्य नंदनी

नीलोत्पल रमेश, गिद्दी, हजारीबाग (झारखण्ड), मो. 9931117537, 8709791120

समीक्षित पुस्तक का नाम: मेरी चुनिन्दा कहानियाँ, कहानीकार: जयनंदन, प्रकाशक: साहित्य भंडार, इलाहाबाद, मूल्य: 400/- 

जयनंदन की कहानियाँ: एक सर्जक कमेंटेटर के पुनर्सृजन का आँखों देखा हाल

हिन्दी कहानी साहित्य में जयनंदन एक जाना-पहचाना नाम है। इनके अब तक बारह कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें 175 के आसपास कहानियाँ संकलित हैं। ये कहानियाँ कहीं न कहीं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर प्रशंसित हो चुकी हैं। इनके कहानी-संग्रह हैं ‘सन्नाटा भंग’, ‘विश्व बाजार का ऊंट’, ‘एक अकेले गान्ही जी’, ‘कस्तूरी पहचानो वत्स’, ‘दाल नहीं गलेगी अब’, ‘घर फूंक तमाशा’, ‘सूखते स्रोत’, ‘गुहार’, ‘गांव की सिसकियां’, ‘भितरघात’, ‘सेराज बैंड बाजा’ तथा ‘गोड़पोछना’। इसके साथ ही इनमें से चुनी हुई कहानियों के प्रतिनिधि संकलन - मेरी प्रिय कथायें’, ‘मेरी प्रिय कहानियां’, ‘संकलित कहानियां’, चुनी हुई कहानियां’, ‘चुनिंदा कहानियाँ’ भी प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी कहानियाँ भोगे हुए यथार्थ का बोध कराती हुईं सामाजिक सरोकार के गंभीर पहलुओं को रेखांकित करती हैं। इन्हें पढ़ते हुए लगता है कि ये कहानियाँ लेखक के आसपास ही घटित हुई हैं, जिन्हें उन्होंने एक सर्जक कमेंटेटर की तरह पुनर्सृजन करके आँखों देखा हाल प्रस्तुत कर दिया है। इनकी कहानियों का विषय गाँव है, जहाँ से लेखक की स्मृतियाँ जुड़ी हैं, फिर कार्य-स्थल हैं, जहां लेखक वर्षों एक कामगार के तौर पर सेवारत रहे। जहाँ-जहाँ विसंगतियों और अन्तर्विरोधों पर उनकी पैनी नजर गयी हैं, वहाँ की समस्यायें और त्रासदियाँ जीवंतता से चित्रण के कैनवास पर उतर आयी हैं। जिस औद्योगिक शहर से लेखक का वास्ता रहा है, वहाँ के मजदूरों के दुख-दर्द और सिसकियों के करुण स्वर कराह की तरह इनकी कहानियों में समाहित होते दिखाई पड़ते हैं। इसके अलावा भी लेखक की सचेत नजरें घर-परिवार, पास-पड़ोस, ऑफिस-शहर की विडम्बनाओं को कैमरे की तरह अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं।
धर्मयुग जैसी पत्रिका में प्रकाशित अपनी कहानी ‘बदरी मैया’ में एक विधवा वृद्ध औरत के साथ उसके कलयुगी बेटों के निर्मम सलूक का बेधक बयान दर्ज है। बदरी मैया अपने पति की मृत्यु के बाद अपनी बेटी बबनी के साथ बेटों का भी पालन-पोषण करती हुई उन्हें किसी चीज की कमी होने नहीं देती। ये बेटे बड़े होकर अपनी बहन की शादी जैसे-तैसे एक गरीब घर में निपटा देते हैं। तमाम सुखों और नाजों में पली बबनी को कष्टकारक अभावों और मुश्किलों में रहने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है। मैया अपनी बेटी को कुछ मदद पहुंचाना चाहती है तो ऐसा करना बेटों और बहुओं पर नागवार गुजर जाता है। ऐसे में वह लुका-छिपाकर कुछ देना चाहती है तो वे उसका इस तरह पर्दाफाश करके अपमानित कर देते हैं जैसी बहुत बड़ी चोरी पकड़ ली हो। मैया को लगता है कि इस घर में अपने बेटों-बहुओं के साथ अब आगे गुजर करना मुश्किल है। वह अपने भाई के साथ नैहर में जाकर रहने का फैसला कर लेती है। जाते-जाते अपना अंचरा फैलाकर बेटों से कहती है कि लो बेटा, मेरी तलाशी ले लो। इस घर में हम भैया का दिया कपड़ा पहनकर आये थे और आज उन्हीं का दिया कपड़ा पहनकर वापस जा रहे हैं। उन्हें अशीषते हुए कहती है कि भगवान तुम लोगन को सुखी रखे। बदरी मैया के बूढ़े भाई अपनी बहन की हालत पर फफक पड़ते हैं। उनके ध्यान में आता हैं कि बहनोई मरे थे तब भी इतनी तकलीफ नहीं हुई थी उन्हें। यह कहानी बदले हुए समाज की नब्ज पर उंगली रखकर पाठकों को भावुक बनाकर बेचैन कर देती है।
‘‘टेढ़ी उंगली और घी’’ तथा ‘‘माफिया सरदार’’ कहानी शहरों में वर्चस्व की लड़ाई में हो रही हत्याओं का जीवंतता से खुलासा करती है। टेढ़ी उंगली और घी में बिल्टू राम बोबोंगा और माफिया सरदार में अफजल मियाँ का चरित्र अपराधिक पृष्ठभूमि में निर्मित हुआ है जो सिर्फ हत्या करके ही समाधान का रास्ता तलाशना चाहते हैं।
‘टेढ़ी उंगली और घी’ कहानी की नायिका रेशमी बिल्टू बोबोंगा से घृणा करती है लेकिन परिस्थिति और समय के बदलाव ने उसके मन में सहानुभूति पैदा कर दी और धीरे-धीरे वह उसके नजदीक आने लग गयी। लेकिन बिल्टू को पता है कि वह सहपाठी रह चुके प्रेरित को चाहती है। वह उसी से प्रेम की ओर उन्मुख रहने की सलाह देता है। यह कहानी प्रेम के साथ राजनीति में भी आने के प्रसंग को बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है। 
‘माफिया सरदार’ एक ईमानदार ऑफिसर वारिस और शहर का दबंग व आतंक का पर्याय अफजल मियाँ के द्वंद्व को उद्घाटित करती है। अंततः ईमानदार ऑफिसर की हार होती है और अफजल मियाँ राजनीतिक प्रभाव में आकर नेता बन जाता है।
अप्रकट कहानी के माध्यम से कथाकार जयनंदन ने पति-पत्नी के बीच बच्चों की मजबूत कड़ी के रूप में समन्वयकारी भूमिका को बहुत बारीकी से चित्रित किया है। कहानी में बेटी अपने पिता को संबोधित करते हुए उनके संबंधों में आने वाले उतार-चड़ाव को उद्घाटित करती है। आज के समाज में ऐसी स्थितियाँ प्रायः देखने को मिल जाती हैं कि पति-पत्नी के बीच थोड़ी सी भी अनबन हुई नहीं कि दोनों दो ध्रुवों में रास्ता अपना लेते हैं। लेकिन अप्रकट में ऐसा नहीं होता है। इसमें दोनों का रास्ता अलग-अलग है, फिर भी दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। ऐसा प्रेम जो अप्रकट है, लेकिन प्रगाढ़ है। बेटी कहती है कि मैं यही मान बैठी थी कि पति-पत्नी के संबंध शायद इसी तरह होते हैं - अपनी-अपनी सीमा संभालते हुए दो दुश्मन की तरह। यह अलग बात है कि मम्मी अगर पाकिस्तान रही....बेमतलब, बेतुकी और विवेकहीन फायरिंग करने वाली तो आप हिन्दुस्तान रहे....जरा संयमित, धीर-गंभीर और चतुर....जवाबी गोली-बारी तो आपकी तरफ से भी हुई ही न। बेटी के द्वारा पिता को यह कहने पर कि ‘‘आप किसी दूसरी महिला को अपने जीवन में प्रवेश दे दें’’ के जवाब में पिता एक दार्शनिक मुद्रा में कहते हैं - जैसे धूप और पानी के संसर्ग में रहने वाली कोई भी खाली जमीन, खाली नहीं रहती अगर वह बंजर नहीं है। बिना उगाये उग आता है उसमें कोई न कोई पौधा या घास। वैसा ही व्यक्ति के साथ भी होता है....उसे भी किसी के सान्निध्य व आत्मीयता की तलब रहती है, जो कभी न कभी पूरी हो ही जाती है। यह कहानी बदलते दाम्पत्य परिवेश को एक नये कोण से परिभाषित करने में काफी सफल रही है।
‘अवांछित बेटियाँ’ कहानी के माध्यम से कथाकार ने लगातार मादा भ्रूणों की हो रही हत्या की ओर ध्यान दिलाया है। अंबर और शाखा पति-पत्नी हैं। शाखा की मानसिकता ऐसी है कि वह सिर्फ और सिर्फ बेटियों की माँ बनना चाहती है, लेकिन उसका पति अंबर ऐसा नहीं चाहता। वह अपनी बहनों के विवाह के समय से बेटियों के कारण घर में उत्पन्न भयावह स्थितियों का गवाह रहा है। वह एक बेटी हो जाने के बाद बेटा चाहता है, यही कारण है कि पत्नी की कोख में आने वाले मादा भ्रूणों की वह लगातार हत्या करवाता चला जाता है। अंत में डॉक्टर भी उससे झूठ बोल देता है और इसी गफलत में एक और बेटी भी जन्म ले लेती है। दूसरी तरफ जितनी मादा भ्रूणों की हत्या होती है, शाखा उन सबके नाम पर नामकरण करके गुड़िया बनाती जाती है और उन्हें सहेज कर रख लेती है। उन सबकी हत्या के अपराध बोध से वह खुद को लहूलुहान महसूस करती है। वह कहती है - ‘‘मुझे माफ कर देना मेरी अजन्मी बच्चियों, तुम सबको कोख में ही मार देने के जुर्म में पति और समाज के साथ मैं भी साझीदार हूँ। चाहती थी कि तुम सबकी और तुम्हारे जैसी अनेकों की माँ बनकर मैं फलों से लदा एक विशाल छतनार पेड़ बन जाऊँ। पति नामधारी पुरुष के बिना गर्भ-धारण करना और भरण-पोषण करना संभव होता और उसमें समाज का कोई दखल नहीं होता तो मैं अपनी दसों इन्द्रियों की कसम खाकर कहती हूं, मैं अभी से सिर्फ और सिर्फ लड़कियों को जन्म देती, जिनकी संख्या कम से कम दो दर्जन होती....बल्कि इससे भी ज्यादा कर पाती तो मुझे और ज्यादा मजा आता।’’ यह कथन सिर्फ कथा-नायिका शाखा का नहीं बल्कि संपूर्ण स्त्री जाति का है। यह कहानी बेटियों को दोयम समझने की मानसिकता को चुनौती देती हुई एक नया आकाश  रचती है।
‘मिसफिट’ कहानी के माध्यम से कथाकार ने समरथ और संधि के हवाले से जैसे अपनी ही कहानी कह दी है। समरथ एक राष्ट्रीय स्तर का कथाकर है। उसकी कहानियाँ देश की सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। लेकिन उसके कार्य-स्थल पर उससे सभी अनभिज्ञ हैं। संधि को जब कारखाने की हिन्दी गृह पत्रिकाओं के प्रकाशन की जिम्मेवारी मिलती है तो वह हिन्दी के रिसालों में रूचि लेने लगती है। इसी क्रम में उसे समरथ के बारे में जानकारी हो जाती है। वह उससे इतना प्रभावित हो उठती है कि उसके लोहा छिलने वाले मशीन-ऑपरेटर के काम से मुक्ति दिलवाकर अपने जन-संपर्क विभाग में स्थानांतरित करवाकर ले आती है। वह चाहती है कि उसकी लेखन-प्रतिभा का स्पर्श पाकर कंपनी की पत्रिकाओं का स्तर बेहतर हो जाये। शाखा के प्रयासों को विभागीय दांव-पेंचों से झटके पर झटके लगने लगते हैं। कथाकार ने समरथ की बेबसी और विभाग के सौतेलेपन से ग्रस्त कार्यशैली की पर्त दर पर्त जो चित्र खींचा है, उससे कारपोरेट घराने की नग्नता खुलकर सामने आ जाती है।
‘भोमहा’ कहानी में कथाकार ने गाँव के एक भोला-भाला व निहायत शरीफ आदमी भोमहा की पत्नी पुनियां देवी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कुत्सित कारनामे की पोल-पट्टी उधेड़ी है। नेता बनने की चाह में वह पथभ्रष्ट और कुलच्छिनी बनती हुई एक कूड़ेदान में तब्दील हो जाती है। अपने कठपुतले की तरह के पति पर अपनी दबंगई थोपते हुए उसे अपना गुलाम सा बना लेती है। बहुचर्चित हो गयी पत्नी से जुड़े रहने की जब भोमहा की हर कोशिशें क्रूरता की भेंट चढ़ जाती हैं तो बगावत स्वरूप उसके अंदर का स्त्री-प्रेम घर की नौकरानी चंपिया के साथ शेष जीवन जीने के लिए बाध्य कर देता है। इस कहानी के जरिये कथाकार जयनंदन ने स्त्री-देह को कई कोणों से देखने की कोशिश की है। पुनियां के रूप में एक नये स्त्री-चरित्र का उदय दिखाकर समाज के एक अंधेरे और अछूते क्षेत्र पर रोशनी डाली गयी है।
‘टापू’ कहानी में कथाकार ने बिजली विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया है। कथानायक नियम-कायदे से अपने घर में बिजली का कनेक्शन लेना चाहता है, लेकिन उसे कई साल लग जाते हैं, फिर भी कनेक्शन नहीं मिलता। अपने पति के उसूलों को नजरअंदाज कर पत्नी मुखालफत करती हुई पहल करती है और विभाग के लोगों को घूस देकर कुछ ही दिनों में कनेक्शन प्राप्त कर लेती है। यह कहानी हमारी व्यवस्था में व्याप्त सड़ांध का पर्दाफाश करती है। कथानायक हुकुमदेव की पत्नी रुक्मी रिश्वत की मदद से अपने टापूपन की स्थिति से तो उबर जाती है लेकिन नायक के टापूपन की स्थिति दयनीय बनकर और गहरा जाती है।
‘चीयर अप कोला ब्लूम 96’ के माध्यम से कथाकार ने एक शहर को महानगर में परिवर्तित होते हुए दिखाया है। साकेत नाम का एक लड़का एक साल का मीडिया कोर्स कर वापस अपने शहर लौटने के बाद ‘‘संवाहिका एंड डिलाइट जींस प्रजेंट्स चीयर अप कोला ब्लूम 96....इंटर कॉलेज फैशन शो एंड कंटेस्ट’’ कार्यक्रम करने की योजना बना डालता है। इस काम में उसके रंगकर्मी पापा और उसकी नाट्य-मंडली के सदस्य साथ नहीं देना चाहते है। वह उन्हें कन्विंस करने के तहत कहता है कि इस कार्यक्रम से संस्था के लिए एक बड़ी राशि जुटायी जा सकेगी। उसकी और उसका साथ दे रहे अन्य युवाओं की जिद और जोश को देखते हुए अंततः नाट्य-मंडली के लोग उसे अपनी संस्था का बैनर लेने की अनुमति दे देते हैं। साकेत का यह कार्यक्रम बहुत बड़ी सफलता दर्ज करते हुए संपन्न हो जाता है। इससे युवाओं में उसका क्रेज बढ़ जाता है। इस अपसंस्कृति के बढ़ते प्रभाव से अब ऐसी चर्चा होने लगती है कि जमाना ऐसे ही शोर और अंग-प्रदर्शन वाले कार्यक्रमों का हो गया है....इस माहौल में अब रंगकर्म नहीं हो सकता। मूल्यों से जुड़ा एक रंगकर्मी अनंग अपना दृढ़-निश्चय प्रदर्शित करते हुए घोषित करता है कि इस माहौल में भी वह नाटक करता रहेगा, कोई साथ नहीं देगा तो अकेले ही करेगा। 
‘ऑफिसर’ कहानी में जयनंदन ने डीपी और जयंत की मजबूत दोस्ती को बिखरते हुए दिखाया है। जब तक जयंत कहानीकार और डीपी कवि रहता है तब तक दोनों में दोस्ती कायम रहती है। लेकिन जैसे ही ऑफिसर डीपी की पाश्चात्य सभ्यता की ओर उन्मुख बेटियों की अश्लील हरकतें शुरू होती हैं, उसकी कवितायें पीछे छूट जाती हैं और जयंत से उसकी दोस्ती भी पुरानी सी लगने लगती है। आधुनिक होने की इसी रेस में एक दिन ब्लू फिल्म की शूटिंग के दौरान छापेमारी में कुछ लड़कियाँ गिरफ्तार कर ली जाती हैं। इनमें डीपी की बेटियाँ भी शामिल रहती हैं और यह अगले दिन के अखबार की सुर्खियाँ बन जाती हैं। लज्जित डीपी को पहली बार महसूस होता है कि उसकी बेटियों के कदम गलत और गलीज रास्ते पर बढ़ गये हैं। अब वह पुनः अपनी जड़ों की ओर लौटने का उपक्रम शुरू कर देता है। जयंत उसका फिर से स्वागत करते हुए कहता है कि अभी भी बहुत देर नहीं हुई है यार। हिन्दी कवि के रूप में तुम्हारी वापसी के द्वार अभी भी खुले हुए हैं। चकाचौंध की दुनिया आँखों पर पट्टी बाँध देती है, जिसका हश्र इस कहानी में डीपी के रूप में दिखाई पड़ता है।
‘श्मशान बस्ती’ कहानी मुर्दों की दुनिया में गुजर-बसर करने वालों की बेबसी, भूख, गरीबी और हाहाकार की हृदयस्पर्शी तस्वीर दिखाती है। श्मशान बस्ती में रहकर दाह-संस्कार में सहयोग करके अपना पेट चलाने वालों से शहर के दबंग-बर्बर गुंडे अवैध काम करवा लेते हैं। हद तो तब हो जाती है जब वे कातिल इलेक्ट्रिक शवदाह फर्नेस चलाने वाले चौसर चंद से भाड़े की हत्या की निशानदेही मिटाने के लिए लाशों को जबरन जलवाकर राख में बदलवा देते हैं। एक दिन चौसर चंद की बेटी रैना का पत्रकार प्रेमी भी हत्यारों का शिकार बनकर रात के अंधेरे में राख में परिणत करवा दिया जाता है। शहर में पनप रहे घिनौने अपराध की दुनिया के चेहरे से नकाब उठाने में कहानी बेहद सफल रही है।
‘निजी सेना’ कहानी बिहार में चल रहे जातीय संघर्ष के मूल कारणों की शिनाख्त करती है। बिहार की रणवीर सेना एक ऐसी ही खून-खराबा करने वाली सेना है जिसने कई सामूहिक बर्बर हत्याओं को अंजाम दिया है। यह सेना एक खास सामंत जाति द्वारा गठित की गयी थी जिसने अपना वर्चस्व और दबदबा कायम रखने के लिए बड़ी क्रूरता से दर्जनों दलितों को मौत के घाट उतार दिया था। यहाँ तक कि अपने विरोधी सजातीयों को भी इसने नहीं बख्शा। सामूहिक हत्या-कांडों की पुलिसिया जाँच-रिपोर्टें भी दबंगों के पक्ष को ही मजबूती प्रदान करती रही थी। कहानी में कथानायक सीवन और उसके भाई भीखन के बापू का यह कथन पूरी व्यवस्था पर प्रश्न-चिन्ह खड़ा कर देता है कि ‘‘भीखन की हत्या सीवन ने नहीं राक्षस चौधरी ने की है साहब....एक बेटे को मारकर दूसरे बेटे को भी बर्बाद करने की नियत है इसकी। आप सीवन को छू नहीं सकते....हिम्मत है तो चौधरी को पकड़िये....उसे फाँसी पर लटकाइये। इस गाँव को जिंदा निगलने पर तुला है वह। वह आदमी नहीं भेड़िया है....राक्षस है....कसाई है....काला नाग है।’’ उसके इस विलाप की कोई सुनवाई नहीं होती। निजी सेना गठित करने वाले चंदन चौधरी आखिर में रात की नींद के वक्त हरिजनों और पिछड़ों के घरों में आग लगवा देता है, जिनमें दर्जनों लोग जलकर भस्म हो जाते हैं। 
‘इंसाफ की भैंस’ कहानी गाँव में होने वाली जातीय राजनीति के दुष्परिणामों को सामने लाती है। छूटभैये नेता अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए गाँववालों को आपस में लड़ा-भिड़ा देने के कुचक्र रचते रहते हैं। भैंस पर मोहित एक आदमी का मानना है कि नौकरी-चाकरी के फेर में पड़ने से ज्यादा अच्छा है नेता बन जाना। इसमें न कोई योग्यता चाहिए, न कोई डिग्री। वह इंसाफ को उस भैंस की तरह समझता है, जो जुगाली करते हुए अपनी धुन में रहती है और किसी की नहीं सुनती। गाँव में एक दलित का सुसंपन्न हो जाना बड़ी जाति वाले को तो छोड़िये, मध्यम जातिवालों को भी सहन नहीं होता। वे उसे षड़यंत्र करके यातनाओं की बलिबेदी पर चढ़ा देते हैं। कहानी में गाँव की आपसी रंजिश खुलकर सामने आती है। 
‘माटी के बलमुंआ’ कहानी गाँव की एक लाचार स्त्री और उसके मतिमंद पति नेटहा की मनःस्थिति की मनोवैज्ञानिक बुनावट पेश करती है। एक मुँहदुबर पति की पत्नी लाचारी और असमर्थता में घिरकर अपने ही जेठ-जेठानियों से शोषण और उपेक्षा का शिकार हो जाती है। बुलकनी काकी का पति नेटहा जुबान रहते हुए भी परिस्थितियों का मूक दर्शक बना रहता है, मानो हाड़-मांस का नहीं माटी का बना हो। बुलकनी पर जब नेटहा के परिवार वाले जुल्म ढाने की इंतहा कर देते हैं तब अपनी पत्नी के पक्ष में नेटहा का मौन मुखर हो उठता है, जिसे देख सब अचम्भित रह जाते हैं। पुश्तैनी जायदाद से नेटहा काका को महरूम बनाने की तमाम साजिशें कहानी में दिखाई पड़ती हैं। नेटहा इन लफड़ों से खुद को निस्संग बनाये रखते हैं और धूर-जानवरों की दुनिया में खुद को खपाये रखते हैं। अन्ततः वे गाँव से गायब हो जाते हैं या गायब करा दिये जाते हैं। परिवार के लोग मरने का बिना कोई सबूत मिले उसका श्राद्ध कर देते हैं। लेकिन बुलकनी काकी उम्मीद नहीं छोड़ती है और रोज जंगल से लौटने वाले रास्ते को हेरती रहती है। 
‘बेलाग ठूंठ’ कहानी दलितों के नृशंस शोषण और उत्पीड़न का मन को झकझोर देने वाला इजहार है। गाँव में दलितों की हालत अपनी जमीन से बेलाग और ठूंठ पेड़ की तरह शुष्क और बेजान जैसी बनी रहती है। बड़े लोग उनसे चाकरी कराना अपना अधिकार समझ लेते हैं। मरनासन्न मुंशी को शहर पहुंचाने के लिए जबर्दस्ती चार बूढ़ों को पालकी में जोत दिया जाता है, जो बेचारे भरपेट खाना के बिना और बढ़ती उम्र के कारण खुद भी चलने-फिरने से लाचार हैं। चूंकि गाँव के सारे दलित युवा बगल के गाँव चले गये हैं नाच देखने। पालकी ढोने वाले बूढ़े कुछ ही दूर चलने के बाद गिर-पड़ जाते हैं। मुंशी का इंतकाल हो जाता है। बूढ़ों को इनका कातिल करार दे दिया जाता है और उनकी हाथ-पैर बाँधकर पिटायी की जाने लगती है। ऊपर से पुलिस को बुला लिया जाता है। पुलिस भी इन्हें कसूरवार समझकर इन पर कहर ढाने लगती है। दारोगा शहर से गाँव घोड़ा पर चढ़कर आता है। रास्ते में पानी-कीचड़ के कारण घोड़ा पस्त सा हो जाता है। दारोगा जी को उस पर दया आ जाती है। अब वे घोड़े की जगह पालकी पर चढ़कर शहर लौटना चाहते हैं। उन्हीं बूढ़ों के चार युवा बेटों को पालकी ढोने के लिए बुलाया जाता है। ये युवा सहन नहीं कर पाते और बीड़ी पीते हुए पालकी में माचिस लगा देते हैं।
इस तरह इस संग्रह की कहानियाँ कथाकार जयनंदन के भोगे व देखे हुए यथार्थ का जबर्दस्त पुनर्सृजन है। विषय वैविध्य की दृष्टि से कहानियों में अभूतपूर्व मौलिकता और शोधपरकता समाहित है। मौजूदा कालखंड को परखने और समझने के अनेकानेक उपकरण इनमें मौजूद हैं। भाषा में प्रवाह और कथ्य में नयेपन ने कहानियों में रोचकता भर दी है। इस संग्रह की हर कहानी कथाकार की लंबे समय की लेखन-साधना से उपजी परिपक्वता की सौगात एक नये ताजा आस्वाद के साथ पाठकों को सुपुर्द करती है।