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सम्पादकीय
August 30, 2020 • देवेंद्र कुमार बहल • संपादकीय

मिलते हैं दोस्त किस्मत से

जो निभाते हैं दोस्ती शिद्दत से

यह खुदाई इंतज़ाम नहीं है तो और क्या?

दोस्ती एक ऐसा धर्म है-

जिसकी न कोई किताब है

और न ही कोई हिसाब

सिर्फ एहसास है किसी के होने का

जिसका बस होना

ही हौसला है मेरे होने का

किसी ने कहा-

‘‘मेरा एक दोस्त है’’

दूसरे ने कहा-

‘‘बड़े नसीब वाले हो’’

किसी ने कहा

‘‘मेरे दो दोस्त हैं’’

दूसरे ने कहा-

‘‘खुशनसीब और बुलंद इकबाल एक साथ!’’

किसी ने कहा-

‘‘मेरे तीन दोस्त हैं’’

दूसरे ने कहा-

‘‘तुम झूठ बोलते हो- दोस्त एक या दो ही हो सकते हैं

बाकी तो भीड़ होती है’’

यह सब कहने की बातें हैं- मैं नहीं मानता। हमारे शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है-

सर्वाः आशा मम  मित्रं भवन्तु।  
समस्त दिशाएँ मेरे मित्र होकर रहें।

दोस्त तो दोस्त दिशाओं तक के दोस्त होने की प्रार्थना है। अर्थात् मेरे चारों ओर दोस्त ही दोस्त हों।

मैं अगर अपनी जिन्दगी की बैलेंसशीट तैयार करूँ तो ऐसेट्स के काॅलम में दोस्तों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त ही होगी। और लाइअबिलिटीज़ काॅलम में उनके एहसाहनात का ब्यौरा होगा। मेरे दोस्तों की मेहबानियाँ ही मेरे वुजुद की बुनियाद है- जश्ने दोस्ती मनाने के लिए- मैं एक ‘‘मैत्री फाॅऊडेशन" को भी आकार देने की सोच रहा हूँ।

आप मेरे से सहमत होंगे कि जो लोग आप के साथ किसी प्रोजेक्ट के इब्तिदाई दौर में जुड़ते हैं उनमें से कुछ लोग आप के वुजुद की बुनियाद बनकर ताउम्र अपनी इनायत बनाए रखते हैं, इससे बढ़कर ज़िंदगी में और कैसी खुशकिस्मती और करिश्में की उम्मीद की जा सकती है? आज मैं इस सम्पादकीय पृष्ठ के माध्यम से आप को अपने ख़ैर-ख्वाह दोस्तों से परिचय करवाता हूँ जिन्होंने मेरे वुजुद को वजनदार बनाया-  

     
    श्री जगजीत सूद                 श्री विजय मल्होत्रा

इन दोनों के साथ मुझे 1972 में काम करने का मौकामिला ‘‘अबट इण्डिया में इन्होंने अभी अभी अपने करियर की शुरुआत ही की थी। मैं इनसे एक क़दम आगे था। मुझे इन की अगुआई करने जिम्मा दिया गया। मेरी मानवीय रिश्तों की प्रयोगशाला में इन्होंने खुदबखुद अपने आप को मेरे सुपुर्द कर दिया और अपने सजने संवरने के लिए मेरे तजुर्बों के साँचें में ढलते चले गए।

इन दोनों की साझी खुसूसीयात मेरी अगुआई ही नहीं मेरी शख्सियत का उनवान बनीं। उन दोनों में मेहनत, प्रतिबद्धता, आसमान को छूने की ललक ही नहीं बल्कि चूम लेने का जज्बा, रिश्ते बनाने और निभाने में व्यवहार कुशलता, मज़बूत इरादे, सतत प्रयासरत रहने, और धुन के धनी आज दोनों करोड़पतियों की फे़हरिस्त में शामिल हैं। जगजीत सूद लुधियाना में और विजय मल्होत्रा लखनऊ में शहर के रसूखदारों की गिनती में आते हैं। मेरी खुशकिस्मती है कि वह आज भी 48 साल से मेरी ज़िंदगी का अहम् हिस्सा हैं और उनकी हिमायत मुझे हासिल है।

मेरी संगत से उन्हें क्या फायदा हुआ यह तो वो ही जाने लेकिन मेरी सोच कितनी समृद्ध हुई यह मैं ही जानता हूँ। उनसे मुझे जो नुक़्ते हासिल हुए उनसे मेरा फलसफा पुख्ता हुआ, विश्वास दृढ़ हुआ और मेरी धारणाओं में ‘‘यक़ीन’’ तहलील हो गया। जो मैं सोचता था सही साबित हुआ कि प्रत्येक इन्सान संभावनाओं का ज़खीरा है, अपनी अगुआई को असरदार बनाने के लिए ‘‘ये करो- ये मत करो’’ के नुस्खे दूसरों पर नहीं अपने पर लागू करने होते हैं। जब आप खुद बेहतर होने का प्रयास करते हैं तो आपके आसपास का पूरा परिवेश खुदबखूद सुहावना और अर्थपूर्ण होने लगता है। उनके साथ काम करने से मुझे आत्म सुधार और विकास का अवसर मिला।

आज जब मैं उनसे मिलता हूँ तो मेरा सीना खुशी से लबालब हो जाता है। जगजीत और विजय मेरे परिवार के अहम् सदस्य हैं और मेरी खुशनसीबी का सबब हैं। उनकी सेहत और तरक्की की दुआओं के साथ :-