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संस्कार
October 29, 2020 • मीनाक्षी मैनन • लघुकथा


मीनाक्षी मैनन, होशियापुर, मो. 9417477999

 

मां ने तीन बेटियों को जन्म दिया, और मां को इस बात का गर्व था। याद है मुझे, मां के उस गर्व से सधे माथे को देख तीन बेटों की मां, मेरी दादी कभी मेरी मां को यह ताना देने की हिम्मत ना कर पाई कि वह निपूती है।

संस्कार युक्त परवरिश, अच्छी शिक्षा, आत्मरक्षा की सिखलाई, खेलकूद, नृत्य, संगीत कुछ भी ऐसा ना था जो अछूता रहा। राखी के दिन मां थाली सजाती और हम तीनो बहने बड़े चाव से पापा को राखी बांधती। पर बाल मन कभी-कभी सहेलियों की बातों में उलझ कर आहत हो जाता। राखी से अगले दिन झगड़ा हो जाता। वो सब कहती पापा, पापा होते हैं; भाई नहीं बन सकते। और हमारा खुश सा मुंह रोंदू सा हो जाता। अच्छे से याद है, एक बार राखी पर मां ने खूब कमाल किया। राखी का थाल सजाया उसमें रोली, फूल और दीपक के साथ एक प्यारी सी मोर पंख वाली राखी रखी, और कुछ सादा राखियां पापा की पसंद की। जैसे ही हम पापा की आरती उतारने लगे मां ने कहा, "सुनो आज अपने भाई की आरती भी उतारो और टीका करो।" और मां ने अपने मंदिर के ठाकुर जी की ओर इशारा किया।

यकीन कीजिए, आज भी भावनाओं में भीगी-सी आंख में झिलमिला जाता है, वह आंसू जो दस वर्ष की उम्र में मेरी आंख में उमड़ा। ठाकुर जी और पापा को राखी बांधी। नेग मिला तो छुटकी इंदु ने कहा, "ठाकुर भाई ने तो नेग दिया ही नहीं।"

भाव विह्वल दादी बोली, "अरी गुड़िया! उसने तो अपना आप ही तुम्हें नेग में दे दिया।" मंझली तो हमेशा जिद करती कि वह साक्षात कान्हा भैया को राखी बांधना चाहती है।

तीस बरस हुए, वह तो उसी के धाम चली गई। बाकी हम दो बहनों की तीन बेटियां हैं। पक्की बात है, ठाकुर जी हमारे परिवार की बेटियों को बहनों के रूप में पाकर खूब प्रसन्न है। रीत अगली पीढ़ी की भी वही है, तीनो बहनें अपने भाई को और पापा को राखी बांधती हैं। कभी कभी हंसती भी है,  "मां ये कान्हा है; हमारे भैया... आपके ठाकुर भैया तो नानी के मंदिर में है।" बड़ी श्रद्धा से वह कान्हा को राखी बांधती है। जो सारे जग का रखवाला है, उसका सुख और वैभव मांगती है।

अमृता शेरगिल