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संवाद
August 26, 2020 • वीनु जमुआर • कविताएँ


वीनु जमुआर, मुम्बई, मो. 8390540808

आओ-
मिल कर दीप जलाएँ
दूर तमस को तज कर आएँ

मन में जो अंधियारा छाए
मिल-जुल कर हम इसे मिटाएँ

संवाद करें,
वाद करें-
प्रतिवाद करें
विचार और
विमर्श करें

कुछ तो बोलें
चुप्प ना साधें
मन की कोई तो-
कभी-
किसी से बात करें

संवाद मिटाता
अंतस का अंधियारा
'स्व' से 'स-हित' की बात करें
आओ कुछ वार्तालाप करें!

आपा-धापी के इस युग में
सिमट गए
घर-आंगन सब के
अंबर खड़ा
नव-वितान पसारे
क़ैदी बन गए हम
अपने ही मन के

आज विपदा
जब आन पड़ी है
स्मृत होती
दादी-नानी की बातें-
जब अति शिखर को छूता है
सृष्टि करवट लेती है
प्रलय की आंधी बहती है
क्षत-विक्षत सब हो जाता है

नया सवेरा आते ही
नवयुग-नवचेतना
हर्षोल्लास,हर्षोत्सव
प्रकृति के कण-कण
में उग आते हैं
जड़ चैतन्य हो जाता है

आओ
मन मुक्त करें
तज कलुषित मन को
बांधे मन की तेज गति को
अति को त्याजें
पंख पसारें-
निर्भय-निर्मल
विहित निर्माण करें

आओ
अतुल्य आह्वान करें!