ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
सरहदें
June 7, 2020 • सुदर्शन प्रियदर्शिनी • कहानी

  सुदर्शन प्रियदर्शिनी

इतने वर्षों बाद अचानक सामने पड़ना जैसे पहाड़ पर चढ़ते हुए आप ने कोई ढुलकता ग्लेशियर देख लिया हो और आप वहीँ बर्फ की तरह जम गए हो या पैरों के नीचे कुछ रेंगने लगा हो। दोनों तरफ बचाव की इच्छा होते हुए भी बचने की उत्कंठा नहीं जागी - जैसे सामने पड़ना चाहते हो या बीच के बीते हुए लम्बे अंतराल को - अंगुली के मिराज़ से फिर से ध्वनित करना चाहते हो - चाहे  वह स्वर बेसुरा ही निकले,पर बजाने का हठ तो नहीं छोड़ सकते थे दोनों।

समय कितना हल्का होता है - सुखद हो या दुखद - हवा के झोंके सा उड़ जाता है।  आश्चर्य होता है कि कैसे तीस वर्ष बीच में से निकल गए - बे आवाज़ - बिना किसी हरकत या थाह के और समय को -हम को या वातावरण को कोई उज़्र  नहीं हुआ।  दो किनारों की तरह - नदी के झंझावात को देखते हुए भी तूफ़ान को रोकने के लिए कोई हाथ नहीं बढ़े कि छत्र - छाया बन कर अंधड़ को बाँध ले। पर जो बीतना होता है बीत जाता है और हमारी हथेलियों में कुछ भी नहीं  बचता और तब लगता भी नहीं कि उन से कुछ बच कर हथेलियों में रहना चाहिए था।  शायद हथेलियों की यही नियति होती है।

जिस घर को तीस साल पहले छोड़ दिया था उस ने - उस घर में बार - बार जाती रही है वह,उस की पगडंडियां चढ़ती - उतरती रही है।  उन पत्थरों पर पैर पटकती रही है।  जो अंदर बसा  है - उन दीवारों पर सर पटक पटक कर भी आज तक शांत नहीं हुआ।  आज भी कुछ है जो उन दीवारों से छन - छन्न कर उस तक पहुंचता रहा है जो कभी रुलाता तो कभी दुलराता रहता है।

आंगन में लौटते - पलोटते मोती की याद आती है।  क्या वह अब भी वहां लौटता पलोटता होगा ! क्या वह अब भी उन्ही झाड़ियों वाले झरने से अपनी - प्यास बुझाता होगा- ! हाँ ! तो मेरी प्यास कहाँ गई। कहीं कल्पनां से भी प्यास बुझती है! वह करीनगी से सजा घर क्यों आज भी उस के जहन में बैठा उसे उठाता - गिराता रहता है।  क्यों नहीं निकलता - मन - प्राण से ! क्या एक बार मन - प्राण में बसा हुआ कुछ,कभी भी नहीं निकलता अंदर से ! क्या वह इतना गहरा खुद जाता है कि मन की दीवारों से मिटने का नाम ही नहीं लेता।  आंधी - तूफ़ान - बरखा जैसे उसे छू तक नहीं पाते।  वह इतने अंदर तक धंसा रहता है कि कभी भी अंगुली से खुरच कर उसे खर्चा जा सकता है। एक व्यतीत हुई स्मृति कभी भी आप के होटों के स्मित में मुस्का उठती है और उम्र भर उन्ही रेशमी धागे को पकड़े - पकड़े आप लटके रहते हैं और जीते जाते है। अन्यथा वर्तमान की आंधियां हमे धाराशायी कर जाती और हमारा वजूद केवल मोहनजोदड़ो बन कर रह जाता। घड़ियों को  गिनने का जब शऊर आता है तब तक घड़ियां बीत जाती हैं।  धीरे - धीरे घड़ियां घटती है और हमारी चलते रहने की चाह बढ़ती जाती है।

होटल की घुमावदार लॉबी चमकीली बत्तियों में जगमगा रही थी और ऊपर शाही महल जैसे शैंडलियरस की रौशनी टुकड़े-टुकड़े होकर एक-एक वस्तु को ज्योतित कर रही थी।  बीच में से निकले हुए वर्ष-पालतू-पिल्लै से आसपास दुबक गए थे और अपनी मखमली स्पर्धा में मुंह उठा रहे थे।

होटल,पार्टी की गहमागहमी,आपस में टकराते गिलास, सरसराती - चमकीली  पौशाकों की चमक,  कहकहे,पैरों की थिरकन,पुरानी यादों की दस्तक,मधुर सितार के सप्तस्वरों की मीठी रोमांटिक बजती धुन - सब कुछ को उस भीड़ में - उन दोनों की एक दूसरे को कनखियों से पकड़ती दृष्ठि ने ढक लिया था  .वे दोनों चाहते थे या एक चाहता था और दूसरा केवल महसूस करता था पर चाहत की सीमा तक नहीं पहुंचता था।  अब उम्र और साल घटते जा रहे थे तो कहीं एक बार मिलने की तीव्रता हड्डियों से बाहर निकलने को तत्पर हो रही थी।

अंजीरी रंग के चकत्तों पर अधमुँदी - मिचमिची आँखे अँधेरे में कुछ टटोलती हुई उस की औरबढ़ीं - चली आयी थी पर वह ढूढ़ रही थी - उन में वही पुरानी मोटी - बादामी शरारती आँखे जो आसपास भवरों के ढेर लगा देती थी - अब सिकुड़ी हुई और सुन्न थी।  डार पर फूल तो थे पर सूखे हुए निरंग और नीरस।  उन आँखों में वह बसंत के कण भी सूख गए थे जो कभी उसे देख कर अपनी चंचलता में उछलते - कूदते थे।  अब न भीग पाएंगी ये आँखे उस बासंती - बौछार में - जिस छतनार - मनुहार पर वह रोमांचित हो उठती थी।

जब हम किसी स्थिति विशेष से गुजर चुकते हैं तो फिर वैसे नहीं रह जाते जैसे उस स्थिति से गुजरने के पहले होते हैं। समय का हर पल कुछ छीनता चला जाता है और एक दिन सब कुछ बदल जाता है।  मन के साथ तन भी। एक बार फिर अतीत की अँगुलियों के स्पर्श देह पर जम गए थे - जैसे बर्फ जम जाती है - पर बाद में पिघल कर अपने चिन्ह छोड़ जाती है।     

कैसी हो !

अच्छी  हूँ।

बहुत दिनों के बाद - किसी पार्टी में देखा है तुम्हे  ....   

मैं अक्सर पार्टियों में नहीं जाती  .   

क्यों ?

यूँ ही।

एक अनकहा सा सन्नाटा  ....  

हमे पहले मिलना चाहिए था।

हाँ !

फिर कहा क्यों नहीं !

उस बची हुई सँध्या का धुंधलका सा उजास - उस के चेहरे में जग सा गया।

कैसे कहती !

क्यों !

डर लगता था !

किस बात का डर !

फिर से विशवास टूटने का डर !

दोनों की आँखें निःशब्द कुछ कह रही थी।  प्रश्न थे जो आँखों में उतर कर ढुलक जाते थे पर मुखर नहीं हो पा रहे थे। मानस  की परत तले रोज इन प्रश्नों को धकेलने का क्रम चलता रहा - कि अभी नहीं - अभी नहीं कह कर उसे चादर तले डाल दिया गया और अपना पीछा छुड़ा लिया पर आजवह केवल स्वपनजीवी कल्पना बन कर नहीं - एक जीती - जागती  वास्तविकता बन कर सामने खड़े थे।  प्रश्न थे जो आँखों में आँखें डाल कर पूछ रहे थे " अब या कब " !

इतना बुरा तो कभी नहीं था कि तुम्हारी बात नहीं सुनता !

पर कुछ - कुछ वैसे हो गए थे।

और अब !

मालूम नहीं !

तो विश्वास नहीं लौटा !

वह चुपचाप चलने लगी - जैसे फिर से किन्ही आँधियों के हवाले हो गई हो।  वह सोच रही थी उस दिन वे कैसे अपनी - अपनी गलियों में कभी पीछे मुड़ कर न देखने के मन्तव्य से मुड़ गए थे, इस प्रण के साथ कि अब उन गलियों के मुहाने इस चौक पर नहीं खुलेंगे - पर शायद कहीं मन में - यह विश्वास भी था कि एक न एक दिन उन की गलियों को किसी मुहाने पर मिलना ही है।

क्या सोच रही हो !

कुछ नहीं !

कुछ तो !

बस यूहिं - कि इतनी छोटी सी जिंदगी को कैसे हम पल भर में नष्ट कर देते हैं  !

यही होता है जब आदमी छाया के पीछे दौड़ने लगता है,फिर एक दिन वह स्वयं  छाया बन कर रह जाता है।

तुम तो मेरे आमन्त्रण पर भी नहीं आयी !

विश्वास जो टूट गया था।

मैंने बहुत प्रयत्त्न किया तुम्हे वापिस बुलाने का !

हाँ जानती हूँ।

पर आयी नहीं तुम !

नदी का बहाव - बहुत आगे बढ़ गया था - तुम न जाने किन मुगालतों में घुमड़ रहे थे।

मुझे स्वयं ज्ञात नहीं !

तो अब ज्ञात है !

हाँ लगता तो है। 

पर पूरा विश्वास नहीं है।

है भी और नहीं भी। 

तुम जानते हो मैं एक बार यहाँ आई भी थी !

यहाँ !

हाँ !

मेरे घर !

हाँ।

पर कब ?

याद नहीं।

फिर खटखटाया क्यों नहीं !

खटखटाया था।  तुम ने खोला नहीं।

मैं यहाँ नहीं हूँगा !

तुम यही थे !

कैसे कह सकती हो !

तुम्हारे गैराज के शीशे से देखा - तुम्हारी कार ही नहीं एक और लाल रंग की कार भी खड़ी थी।

अच्छा !

जैसे तुम्हे मालूम ही नहीं !

एक खिसियाहट सी फैल गयी - वैभव के चेहरे पर।

अब भी क्या उस के साथ रहते हो !

किस के साथ !

जिस की कार थी।

कोई क्लायंट होगा -

क्लायंट की कार - गैराज में बंद नहीं रखी जाती - वह भी सुबह - सुबह आठ बजे !

तो तुम सैर करती हुई आई थी।

हाँ ! बात बदल रहे हो।

वैभव चुप हो गया

मैं ठीक कह रही हूँ न !

वैभव के पास उत्तर नहीं था।

उत्तर नहीं है तो मत दो। कोई विवशता नहीं है।  मैं तुम से कोई सफाई नहीं मांग रही हूँ -

हूँ !

सफाई मैं देना भी नहीं चाहता।

तो इसी लिए तुम नहीं लौटी !

मैं तो लौटी - पर जिन कारणों से गई थी- वह कारण नहीं बदले- वहीं के वहीं रहे।

अब क्या कहती हो !

कुछ भी नहीं !

शायद तुम्हारे ड्राइव वे पर अब भी उन टायरों के निशान खुदे हों।  उन पर मेरी कार के टायर तो फिसल ही जाएंगे न! 

जब ऐसा मोहभंग होता है तो जीवन का कोई पड़ाव बेपैंदे लोटे सा आप के सामने लुढ़कने लगता है। पहले मोहभंग की चुभन- क्यों उम्र भर सालती रहती है और उस के नश्तर अंदर ही अंदर सौतन की तरह काटते रहते हैं। वह अंदर ही अंदर बिसूर रही थी शायद !

देखो बर्फ गिरनी शुरू हो गई है।  सामने रॉक साइड की सड़क सफेद चादर बनती जा रही है।

मुझे चलना चाहिए।

नहीं थोड़ी देर रुक जाओ।  पार्टी में वापिस नहीं जायोगी !

नहीं और फिर किस अधिकार से रोक रहे हो  ?

तुम्हारा दामन तो साफ़ है न !

मेरी शायद पुरानी पीढ़ी है और पुराने जर्जर संस्कार हैं जो नये - पुराने होकर अपना रंग नहीं बदलते।

क्या कह रही हो !

दकियानूसी भाषा बोल रही हूँ - अमरीका में रह कर भी हमारे बीच यही अंतर रहा। .मैं अपनी अँधेरी - सुरंगों से नहीं निकल सकी और तुम ने छलांग लगा कर बिना 

पीछे देखे - सारी सरहदें पार कर ली।

अब जो बीत गया - वह वापिस नहीं हो सकता।  सम्बन्ध बहते पानी की तरह हो जाते हैं।  बह गया पानी कभी वापिस नहीं लौटता।  अगर लौटायो तो गन्दला होजाता है उसी तरह सम्बन्ध।

तुम समझते हो पगडंडियां केवल चढ़ने के लिए ही होती हैं !

तो !

चढ़ने - उतरने दोनों के लिए मान कर चले तो पूरक बन जाती हैं जो शायद तुम ने नहीं समझा !

क्या कहती जा रही हो !

तुम्हारा सारा आयाम एक तरफा था और अस्थायी भी !

शायद मैं तुम्हारी ऊंचाई तक कभी पहुँच ही नहीं पाया।

काश ! स्वयं ही छुआ - छुअन का खेल शुरू कर के आखिर तक अपनी पारी निभाते !

वह कहीं बीते हुए दिनों के बचे हुए चिन्ह देखना चाहती थी - पर होटों की फुफुसाहट में शब्द डूब जाते थे।

क्या कहा !

कुछ नहीं !

लज्जित हूँ अपने - आप में।  रोज स्वयं को तोलता हूँ पर तुम से बराबरी का पांसा नहीं बिठा पाता। अब तो रास्ते ही बंट चुके हैं।

बर्फ के बड़े बड़े फुग्गे  सड़क,पेड़,पगडंडियों को अपने आगोश में भर रहे थे और उस के पैर धीरे - धीरे सड़क पर पड़ी बर्फ में धँसने लगे। 

आगे बढ़ कर वह पार्किंग - लॉट  में चली गई।

कार का दरवाजा खोला और बिन पीछे देखे - कार  स्टार्ट कर दी।  

एक बार फिर सारी सरहदें चुप रहीं।  

ओहया, यू.एस.ए. (M. 014405390873)
email:sudarshansuneja@yahoo.com, sudershen27@gmail.com