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शाह बहराम सियाह गुंबद में
October 23, 2019 • हकीम नेजामी गंजवी

शाह बहराम के मन में अचानक शराब और शबाब की ललक जागी तो शैनचर के दिन उसने काले वस्त्र धारण किए और उमंग से भरा हिन्दुस्तानी शहज़ादी से मिलने 'सियाह गुंबद' का रूख किया ताकि वहाँ रात खुशगुज़रानी और मयनोशी में बसर कर सके और लोबान व अगरबत्ती की सुगन्ध का रूहानी सुख उठा सके।

जब रात की कालिमा ने अपने केश भोर की सफेद चादर पर बिखेर दिए तो आनन्द में सराबोर शाह बहराम ने अपनी मलिका से ऐसी कहानी सुनाने की फर्माइश की जिसे सुन कर मुँह का मज़ा बदल जाए और आँखे गहरी नींद के ख़ुमार में डूब जाएं।

शहज़ादी ने पहले बादशाह की भूरि-भूरि प्रशंसा की फिर क़िस्से का आग़ाज़ किया।

मैंने अपने बुजुर्ग़ों की ज़बानी सुना है कि राजमहल की कनीज़़ों में से एक कनीज़़ का आना-जाना हमारे घर भी था। वह पवित्र, अच्छे स्वभाव और व्यवहार की थी। हर माह जब वह हमारे घर आती तो उसके तन पर सदा काला लिबास होता। उसकी एकरंगी पसन्द देख हम सब चकित थे। जब हमसे नहीं रहा गया तो हमने इसका कारण जानना चाहा। उसको महसूस हो गया कि हम बिना जाने उसकी जान नहीं छोड़ेंगे तो मजबूरन उसने ज़बान खोल दी।

“मैं कभी शाह की कनीज़़ों में हुआ करती थी। आज उनकी मृत्यु को बरसों गुज़र गए हैं मगर अभी तक मैं उन्हें भुला नहीं पाई हूँ। वो फिराक़दिल, मेहमान नवाज़ और क्षमा प्रदान करने वाली महान आत्मा थे। वे अतिथि के आते ही उसके आगे तरह-तरह के व्यंजन परोसे जाते फिर शाह उसके साथ शतरंजबाज़ी में व्यस्त हो जाते। बीच-बीच में शाह उसके दिल की थाह लेते और उसके सुख-दुःख के बारे में पूछते। मेहरबानी व दोस्ती का यह माहौल देख मेहमान अपना दिल खोल देता और अपना सुख-दुःख बयान कर देता। शाह बड़ी रुचि से उसकी बातें सुनता। अतिथि सत्कार का यह सिलसिला लगातार चलता रहता यदि शाह अचानक ग़ायब नहीं हो जाते। और अक्समात जब लौटते तो सर से पैर तक काले लिबास में पोशिदा होते। किसी में इतना साहस नहीं था कि वह इसका कारण पूछते। मैंने मन ही मन ठान लिया कि मैं आज की रात बादशाह की सेवा करूँगी। और यह राज़ जानने की कोशिश करूंगी। रात को शाह बड़े स्नेह और वेदना से मेरे समीप बैठे, नश्वर संसार की गर्दिश की चर्चा करने लगे कि वह किसी को नहीं छोड़ती है। इस निष्ठुर आकाश ने मुझ जैसे बादशाह को भी अपने छलावे से वंचित न रखा।''

मैंने उनके तलवों को सहलाते हुए कहा, ए-“सबसे महान आत्मा! मुझसे आप कुछ न छुपाएं जो भी मन पर बीत रही है या आप पर बीती है उसे सुना कर अपना मन हल्का करें।''

शाह ने मुझ पर विश्वास किया और अपने मन का भेद मुझ पर खोल दिया, “एक दिन की बात है कि मेरे सम्मुख एक ऐसा अतिथि उपस्थित हुआ जो जूता, टोपी, वस्त्र, सारे के सारे काले रंग के पहने हुए था मैं अपनी जिज्ञासा को दबा न सका और उससे पूछा कि आखिर इस काले वस्त्र धारण करने का वजह क्या है? उसने बताने से इंकार करते हुए कहा कि मैं यह राज़ हर व्यक्ति के सामने नहीं खोल सकता हूं, सिवाए उस शख़्स के जिसने स्वयं काले वस्त्र धारण कर रखे हों। मैंने अपनी दिलचस्पी प्रकट करते हुए उस पर काफी दबाव डाला, मेरे बढ़ते इसरार पर वह इंकार पर इंकार कर रहा था। मगर मेरे लगातार तक़रार से समझ गया कि मैं भेद को सुने और जाने बिना उसे मुक्त नहीं करूँगा। वह बेचैन और मेरी मेहमान नवाज़ी से बोझिल मजबूर हो उठा और झिझकते हुए उसने कहना आरम्भ किया -

''चीन देश में एक नगर है जिसका नाम 'मधुशान' है और उसके नागरिक काला वस्त्र धारण करते हैं। उनका मुखमंडल चाँद के समान सुन्दर और बाक़ी तन काले वस्त्र से ढके रहते थे।'' इतना कहकर वह रुक गया, “इससे आगे अब मैं एक शब्द भी नहीं कहूँगा, चाहे मेरा सर धड़ से अलग कर दो।'' इतना कहकर उसने अपना बिस्तर बाँधा, सामान समेटा और चलने लगा। मगर मुझे एक पहेली दे गया और ऐसी बेक़रारी जो दीवानगी के समीप होती है, मेरे बहुत पूछने पर वह वास्तव में गूंगा बन गया। मजबूर होकर मैंने हीरे जवाहरात लिए और यात्रा पर निकल पड़ा। पूछते-पूछते अन्त में उस शहर में पहुँच गया। शहर क्या था सुन्दर हरे भरे फूलों से लदी बाटिका थी। लोग ऐसे हृष्टपुष्ट जैसे शेर, मगर तन पर जैसे कोलतार मले हुए प्रतीत हुए।

एक वर्ष तक मैं वहाँ रहा। जिससे भी नगर का हाल-चाल पूछता, कोई जवाब न देता। अन्त में एक जवान क़साब से भेंट हो गई, उससे मैंने मित्रता बढ़ाई। वह जवान नेक विचार और पवित्र आचरण का स्वामी था। उसको प्रतिदिन मैं कुछ न कुछ

धन भेंट करता और घनिष्टता जताता था। एक दिन मैंने अधिक मात्रा में उसे सोना भेंट कर दिया जिसके बोझ से वह दुखी हो उठा और उस दिन शाम को उसने मुझे अपना अतिथि बनाया। उसके घर में संसार का सारा सुख था, व्यंजन तरह-तरह के, मेरे सामने रखे थे। भोजन करने के बाद वह मुझसे बोला कि आखिर इतना सोना मैंने उसे भेंट क्यों किया है? पहले ही वह मेरे उपहारों से उबर नहीं पा रहा है अब तो मेरा खज़ाना भी उबलने लगा है। मैं तो थोड़े में ही संतुष्ट था मगर इतने धन का अर्थ और लाभ क्या है?'' फिर ठहर कर बोला, “इन सारे उपकारों का बदला मैं कैसे चुकाऊँगा। यदि आप जान भी चाहें तो मैं देने के लिए हाज़िर हूँ। वह भी शायद आपके द्वारा किये गये उपहारों का बदला नहीं हो सकती है। यदि आपकी कोई इच्छा हो तो कृपया कहें वरना मेहरबानी करके जो भी भेंट दिया है आपने उसे वापस ले लें।''

मुझे जब उसकी मित्रता व बलिदान का विश्वास हो गया तब मैंने अपने अतिथि की कहानी कह सुनाई। और उससे काले वस्त्र का भेद जानने की इच्छा प्रकट की। मेरे प्रश्न को सुनकर जवान क़साब के मुख का रंग उड़ गया। उसका सर इस प्रकार से भयभीत हो नीचे झुक कर सीने से लग गया जैसे मेमना भेड़िये को देखकर सकपका जाता है। वह इस प्रकार बग़लें झाँकने लगा जैसे अपने बचाव में कुछ कहना चाह रहा हो, फिर झिझकते हुए बोला, “भेद खोलना उचित नहीं है, मगर कहे बिना कोई चारा नहीं है।''

पौ फट रही थी। उस समय वह घर से बाहर निकला और मुझे भी अपने पीछे आने का इशारा किया। अब नगर व आबादी से दूर निकल हम एक वीराने में खड़े थे। वह एक टोकरी लेकर आया जो हर तरफ से रस्सी से कसी हुई थी उसे बढ़ाते हुए बोला, “इसमें बैठ जाओ ताकि दोनों संसार यानी आकाश और

धरती को देख सको। फिर तुम जान जाओगे कि यहाँ काले वस्त्र को धारण किये हर व्यक्ति शाँत और चुप क्यों है।''

जैसे ही मैं टोकरी में बैठा । वह मुझे किसी पक्षी के समान ऊपर उड़ा कर ले गई। मेरे गर्दन में बंधी रस्सी मुझे कष्ट दे रही थी। मुझे महसूस हो रहा था जैसे मेरी आत्मा उससे बंधी। हुई थी। उड़ते-उड़ते मैं एक लोहे की छड़ के पास पहुँचा। वह लम्बी छड़ मेरे सर पर थी, जो टोकरी के ऊपर लटक रही थी। जैसे ही टोकरी समीप पहुँची रस्सी में गाँठ लग गई और वह उस छड़ से लटक गई और मैं आकाश और धरती के बीच उस छड़ से लटकने लगा। अब न मैं ऊपर देख सकता न अपने इधर-

उधर। मैंने भय से अपनी आँखें बन्द कर लीं, और मन में अपने घर लौटने की तड़प महसूस की तभी एक बड़ा सा पक्षी उड़ता हुआ आया और उस लोहे की छड़ पर बैठ गया। वह राक्षस जैसा था उसके पंख पेड़ों की शाखाओं के समान लम्बे, पैर तख़्त के पायों के समान भारी व चोंच स्तम्भ की तरह लम्बी और मुँह गुफा के समान गहरा था। मैने मन ही मन कहा यदि मैं इस पक्षी का पैर पकड़ता हूँ तो यहीं उसके द्वारा शिकार हो जाऊँगा। अगर सब्र करता हूँ तो इतने भयानक स्थान पर मेरा होगा क्या? खुदा का नाम लेकर मैंने उस पक्षी का पैर पकड़ लिया। अचानक वह उड़ा और मैं भी उसके साथ नीले गगन की ऊँचाईयों में खोने लगा। सुबह से उड़ता-उड़ता यह पक्षी दोपहर में जब सूर्य की गर्मी बढ़ गई तो नीचे उतरने लगा, जब उसके पैर

धरती से एक भाले भर की ऊँचाई पर थे तो मैंने उस पक्षी का पैर छोड़ दिया। मैं फूलों और नर्म घास पर आ गिरा। एक घंटे तक मैं उस पर पड़ा सुसताता रहा, फिर जाने क्यों दिल भर आया और मैंने रोना आरम्भ कर दिया। रुलाई रोकना मेरे बस की बात न थी। जिस बाग़ में मैं उस समय था वह ऐसा धुलाधुलाया था जैसे कि धूल का कण भी उधर से न गुज़रा हो, रंग-बिरंगे फूल सुगन्ध से भरे झूम रहे थे।

हर ओर से जलप्रपात गुलाब जल के समान बह रहे थे। उसमें मछलियाँ इस प्रकार से तैर रही थीं जैसे चाँदी के टुकड़े। बाग़ को चारों तरफ से पन्ने के रंग की पहाड़ियाँ घेरे हुए थीं। उन पर लाल रंग के पत्थर वनस्पति रहित याक़ूत के समान दहक रहे थे। आश्चर्य चकित मैं प्रकृति के इस सौन्दर्य को निहार रहा था। भूख लगी तो रसीले फल तोड़ कर खाये और खुदा का शुक्र अदा किया। फिर सरू के वृक्ष के नीचे ऊँघते-ऊँघते मैं सो गया। आधी रात ही गुज़री थी कि धूल का तूफान आया और मुसलाधार पानी बरसा। बाग़ धुल कर और भी चमकने लगा। तभी अचानक एक ओर से हज़ारों हूरें आती नज़र आईं और मार्ग पर यूँ पंक्तिबद्ध खड़ी हो गईं जैसे बुतखाने में मूर्तियाँ सजी हों।

वे अपसराएँ वसंत की चिटखती नई कलियों के समान ताज़ा खिली, लाल रंग के रूबी पत्थर की तरह उनके सुर्ख होंठ, कान व गर्दन में तरह-तरह के आभूषण, हाथों में शमा और सर पर सिंहासन रखे हुए आती दिखीं। कालीन को उन्होंने धरती पर बिछा कर उस पर वही सुन्दर नक्काशीदार (तख़्त) रखा। पल भर बाद ही एक चन्द्रमा के समान दमकते चेहरे वाली हसीना आसमान से उतरती दिखी जिसने अपने रूप की चाँदनी से अन्य हूरें व कनीज़़ों के सुन्दर मुख मलिन कर दिये थे।

वो चन्द्रमुखी आकर तख़्त पर बैठी चेहरे का नकाब हटाया और पैर की जूतियाँ उतारी। थोड़ी देर सर झुकाए यूं ही बैठी रही फिर सर घुमाकर अपने समीप बैठी परी से बोली, ''मुझे लगता है कोई है यहाँ, मुझे बू आ रही है किसी आदमज़ाद की। उठो ढूंढो! और उसे पकड़ कर मेरे पास ले आओ। परी उठी और इधर-उधर ढूंढ़ते हुए जब मेरे समीप पहुँची तो मुझे देख कर ठिठक गई और आश्चर्य से उसने दाँतों तले ऊंगली दबा ली। मेरा हाथ पकड़ कर उसने मुझे उठाया। मैं तो इस प्रतिक्षा में ही था, फौरन खड़ा हो गया और उसके साथ चलते-चलते उस माहजबीन के समीप पहुँचा। वहीं धरती पर उसके क़दमों पर गिर पड़ा, लेकिन मेरी यह हालत देखकर वह बोली, ''उठो। इधर आओ! आकर मेरे पास बैठो''।

यह सुनकर मैं शर्म से गड़ गया। और कह उठा, ''ओ नूरे जन्नत। मुझ जैसे नाचीज़ को यह मुक़ाम मत दो। यह तख़्त तो बिलक़ीस1 का है हम जैसों के लिए नहीं है बल्कि इस पर तो सुलेमान2 जैसी महान आत्मा बैठ सकती है। मैं तो इस बियाबान में दैत्य बन गया, अब सुलेमान बनने का दावा करना बेकार है।''

उस माहजबीन ने कहा, “बहाने बनाना छोड़ो। आओ मेरे समीप बैठो और मेरी सोहबत का लुत्फ लो तभी एक कनीज़़ ने मेरा हाथ खींच कर उस तख़्त पर बिठा दिया। जैसे ही मैं उसके समीप बैठा, उसने मुझसे बड़े लुभावने अन्दाज़ में बात करना आरम्भ कर दी। यहाँ तक की दस्तरख्वान बिछ गया। स्वर्ग के ऐसे मज़ेदार व्यंजन जिसके बारे में कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था वहाँ सजे हुए थे। भोजन के बाद, साज़न्दे व गायक आ गये और साक़ी अपनी सुराही से सबके प्यालों में मदिरा भरने लगा। गाना-बजाना व नृत्य आरम्भ हो गया था।

खून की गर्मी और मदिरा की मस्ती उस पर से प्रेयसी की समीपता! मैं उसके क़दमों पर लम्बे केशों की तरह बिछ गया। उसके नाज़्ाुक चरणों का बोसा लिया। उसकी दिलरूबा मुस्कान और अदाएँ, मैं एक चुम्बन लेता वह हज़ार देने को तैयार थी। मैं इस तरह से प्रेम के सागर में गोते लगा रहा था जिसने मुझे बेकाबू कर दिया, मेरा यह रूप देखकर उसने कहा, “बस! आज की रात की हद यहीं तक ही है। मेरे संयम का बांध टूट चुका था। यह देखकर वह बोली, “यदि तुम्हारा मन काबू में नहीं है तो बेहतर है मेरी कनीज़़ों से तुम किसी एक को पसन्द कर लो ताकि उसे मैं तुम्हें बख़्श सकूँ। वह तुम्हारी देखभाल भी करेगी और प्रेयसी वाला सुख भी देगी, फिर कल रात यदि चाहना तो मैं तुम्हारी इच्छा पूरी कर दूंगी।” इतना कह कर उसने एक कनीज़़ को अपने पास बुलाया और मेरे हवाले कर दिया। उस सुन्दर मुख मण्डल वाली कन्या ने मेरा हाथ पकड़ा और हम शयनकक्ष में पहुँचे। जहाँ चारों तरफ रेशम के पर्दे लहरा रहे थे, और जलती शमाएं फड़फड़ा रही थीं।

हम दोनों वस्त्रवहीन होकर बिस्तर पर लेट गये, नाज़्ाुक नर्म, गर्म और सुर्ख व सफेद फूलों से भरा बिस्तर मेरे समीप था। उसके कौमार्य को मैंने बन्द सीप की तरह खोला। मेरे बिस्तर को इत्र और काफूर से ओतप्रोत कर वह सुबह तक मेरे संग मुझे सुख देती मेरे अंक में समाई रही।

आँख खुलते ही उसने हमामखाना गर्म किया। फिर गुलाब जल में हमने अपने शरीर को धोया। जब मैं नमाज़ पढ़ने के लिए खड़ा हुआ तो मेरी आंखों के सामने से वह परियाँ और अप्सराएं गुम हो चुकी थीं, वहीं हरियाली पर मैं लेट गया और भोर से लेकर सन्ध्या तक बेसुध पड़ा सोता रहा। जब रात आई और कस्तूरी की महक फैली, मैं सपने से जागा और हौज़ के किनारे जाकर बैठ गया।

कल रात की तरह फिर धूल के बादल आये, फिर मूसलाधार बारिश और उसके बाद इत्र अगरबत्ती और लोबान की महक फैली। फिर वह अप्सराएं आईं। तख़्त लगाया और समारोह आरम्भ हो गया। वह सुन्दरी फिर तख़्त पर आकर बैठी। उसने मुझे पास बुलाकर बिठाया और कल रात की तरह मीठी-मीठी बातें करने लगी। भोजन आया स्वादिष्ट और सुगन्ध से भरपूर, फिर मदिरापान और संगीत व नृत्य का आरम्भ । सुन्दरी ने फिर मेरे ऊपर नैनों के बाण चलाने आरम्भ किये और मैं प्रेम का मारा घायल परिन्दे की तरह फड़फड़ाने लगा। हम व्याकुल थे तभी उसने इशारे से सखियों व अप्सराओं को जाने का इशारा किया और तन्हाई चाही। मैंने दीवानगी में आगे हाथ बढ़ाया ताकि उसे अंक में भर लूं, तभी वह चीख पड़ी, “यह समय बेताबी का नहीं है, केवल सब्र करो, यह रात बेहोशी की नहीं है।''

मैंने जितनी भी व्याकुलता दिखाई, प्रेम दिखाया मगर वह लगातार कहती रही कि अपने को रोको, अपने को संभालो। फिर उसने एक सुन्दर कनीज़ को मेरे हवाले करते हुए वचन दिया कि एक दिन वह अपने को मेरे हवाले कर देगी, मगर अभी सीमा सिर्फ चुम्बन तक है। मैं क्या करता उसका यह व्यवहार देखकर, शांत हो कल की आशा में उसे मैं चूमता रहा । वासना पहले दिन से अधिक मुझे उद्वेलित कर रही थी। उसने मेरी वासना की अग्नि को देखते हुए मुझ पर अंकुश लगाया और अपने को अलग करती हुई पीछे हटी और कनीज़ के साथ मुझे शयनकक्ष में भेज दिया।

जैसे ही भोर का तारा डूबा, वह चमत्कार और भ्रम मेरी आँखों से ओझल हो गया और - मै अकेला उस बाग़ में रह गया। रात आने की प्रतिक्षा और सुख की कल्पना में डूबने लगा। बहुत दिन तक यही सिलसिला चलता रहा, सूर्य के प्रकाश में दिन वीरान और रात आबाद चन्द्रमा की ज्योति में रात के पहले पहर में शराब व संगीत की महफिल जमती और देर रात को हूर के आगोश में स्वर्ग का मज़ा लूटता।

उसके मिलन की आशा में मैने न जाने कितने दिन और रातें गुज़ार दी थीं। उस दिन भी वही हुआ। अप्सराओं ने समारोह आरम्भ किया विभिन्न व्यंजन परोसे गये। साक़ी ने सुराही से पैमानों में मदिरा छलकाई, नृत्य व संगीत की लहरी ने सबके बदन में एक मदमाती मस्ती भर दी। मुझ पर काम वासना का बुखार चढ़ने लगा, तन फ़ुकने लगा, मन जलने लगा। काँपते हाथों से मैंने उस माहजबीन के कमर में हाथ डाला और चाहा कि आज अपनी इच्छा की पूर्ति कर लूँ कि उसने बड़े प्रेम से मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपनी कमर से हटाते हुए बोली, ''इसके आगे सीमा रेखा है।” फिर हाथों का चुम्बन ले मुझसे सट कर बैठ गई और अदा से बोली, “बंद खज़ाने पर हाथ मत रखो वरना दौलत की इच्छा से फैला हाथ खाली ही रहेगा।''

मैंने बेचैन होकर कहा, “मेरे चाँद। तुमने चेहरे का नक़ाब हटाकर मेरा चैन और करार छीन लिया है, मेरी जान हल्क में अटकी है। इस दुख का निदान क्या है? तुम कहती हो मैं दुखी न हूँ और अपने को मेरी महबूबा भी कहती हो, मुझे भय है इस कपटी राजपाठ के दावपेच से जहाँ पर भेड़िये का स्वभाव रखने वाले लोग रहते हैं। वह एक दिन मेरे ऊपर हमला कर मुझे समाप्त कर देंगे और मेरी इच्छा मेरे मन में घुट कर रह जाएगी और मैं नामुराद इस संसार से आँखें मूंद लूँगा। यदि आज की रात तुमने मेरी इच्छाओं का कपाट बन्द रखा तो वास्तव में मैं अपनी जान दे दूंगा।''

उसने जब मुझे पूर्ण रूप से बेताब और कामुक देखा तो मेरा मनुहार करते हुए कहा, ''तुम्हारे यह नखरे मैं उठाऊँगी, मगर इस इच्छा की पूर्ति में तुम जल्दबाज़ी कर रहे हो यक़ीन जानो अगर बेद की साख़ से लोबान की सुगन्ध आने लगे तो मुझसे भी इस प्रकार की इच्छा पूरी हो सकती है। उसने फिर एक कनीज़़ मेरे हवाले की, जिससे मैं अपनी कामवासना शाँत कर सकूँ और उसका पीछा छोड़ दूँ।

इस बार मैंने तय कर लिया था कि बार-बार उसके चक्कर में पड़कर धोखा नहीं खाऊँगा। मैं जितना चाहता था कि अपने को रोकूँ और शाँत रहूँ उतनी ही ज्वाला मेरे अस्तित्व को जला रही थी। अन्त में वासना के सैलाब से बह कर मैंने याचना की, “जब मेरे दोनों पांव उस ख़ज़ाने की दहलीज़ पर पहुँच चुके हैं तो तुम्हीं बताओ कि उसे हासिल करने की बजाय मैं खाली हाथ कैसे लौट जाऊँ? या मेरी काम वासना शांत करो या फिर मुझे सूली पर चढ़ा दो। यदि चाहती हो मेरा कत्ल करना तो उठो, देर मत करो वरना मेरे खून का वेग जो तीव्र गति से मेरी

धमनियों में दौड़ रहा है कहीं मुझे दीवाना न बना दे।

जब उसने देखा कि आज मैं किसी प्रकार से उसकी बातों में आने वाला नहीं हूँ और न ही किसी वायदे से बहलने वाला नहीं हूँ तो फिर उसने मुझे सौगन्ध दी, वचन दिया कि केवल एक रात तुम गुज़ार लो कल अवश्य मैं तुम्हारी इच्छा की पूर्ति कर दूंगी। मगर इसके बावजूद मैं अपनी बात पर अड़ा रहा, तंग आकर उसने कहा, “अच्छा मैं हारी। अब तुम जरा अपनी आँखें बन्द तो करो। जैसे ही आँखें खोलोगे मुझे अपने अंक में भर लेना।''

जैसा उसने कहा था मैंने वैसा ही किया। अपनी आँखें बन्द कर ली, क्षण भर बाद वह बोली, “आँखें खोलो!” मैं इस आशा में कि अपनी महबूबा को अपने पहलू में पाऊँगा। मैंने आँखें खोल दी। निराशा से मैंने देखा कि मैं उसी टोकरी में बैठा हूँ। उस सारे सुख का निशान भी नज़र नहीं आ रहा है। कुछ देर बाद मेरा पुराना मित्र क़साब मेरे पास आया, रस्सी खोलता हुआ बोला, “मैं सौ साल तक यदि इस सत्यता को बताता रहता तो भी तुम्हें विश्वास न होता और अब वह भेद किसी को बताने वाला नहीं है। मैं ख़ुद उस जोश में उबला था और उसी के कारण आज तक काला वस्त्र धारण किये हुए हूँ।''

उसका वाक्य समाप्त हुआ मैं टोकरी से निकल कर खड़ा हुआ और उससे बोला, “मेरे लिए भी काला वस्त्र ले आओ, ताकि मैं भी पहनना आरम्भ कर दूं।”

उस कनीज़़ ने कथा के अन्त में कहा, “मेरे अन्नदाता ने यह भेद मुझ पर खोल दिया जब कि मैं उनकी खरीदी हुई एक तुच्छ कनीज़़ थी, तब मेरे लिए आवश्यक हो गया था कि मैं वही करूँ जो मेरे मालिक का व्यवहार व आचरण है। बस उस दिन से आज तक मैं काला वस्त्र धारण करने लगी हूँ।''

शहज़ादी सुन्दरी, ने जब यह किस्सा समाप्त किया तो बहराम ने खुश होकर उसकी जी भर कर प्रशंसा की और उसे अपने अंक में भर गहरी नींद में डूब गया।

 

  1. बिलकीस: उनकी पत्नी। 2. जानवरों के पैगम्बर जो उनकी भाषा जानते थे।