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शेख सनआन
October 23, 2019 • शेख फरिउद्दीन अत्तार

शेख सनआन अपने समय के रूहानी सूफी संत थे। उन्होंने लगभग पचास वर्ष काबे में इबादत की थी। शेख़ तो शेख मुरीदों का यह हाल था कि वे सब दिन रात इबादत में मसरूफ रहते थे। ख़ुद शेख नमाज़ पढ़ते, रोजे रखते और धर्म के हर वचन का पालन करते थे। उन्होंने पचास हज किये थे। संक्षेप में वह एक आत्मशक्ति के द्वारा चमत्कारिक सिद्धियों को प्राप्त करने वाली एक महान आत्मा थे। शेख़ की सांसों में एक अलौकिक शक्ति थी कि रोगी निरोग हो जाते थे और उनकी समीपता के आनंदातिरेक से झूमने से लगते थे।

एक बार शेख़ सनआन ने लगातार कई रात यह सपना देखा कि वह मक्का से रोम चले गये और वहाँ मूर्ति पूजा कर रहे हैं। शेख इस सपने से बहुत परेशान हुए क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया कि यह सपना किसी आने वाली दुर्घटना का सूचक है जिससे बच सकना आसान नहीं है। शेख़ ने सोचा - रोम की ओर चल देना ही उचित है। शायद वहां जाकर यह गुत्थी सुलझ जाए, लेकिन यदि मैंने लापरवाही दिखाई तो शायद मैं किसी रूहानी तकलीफ में पड़ कर सही रास्ते से भटक न जाऊँ।

अन्त में शेख़ ने यात्रा करने की मन में ठान ली। और अपने मुरीदों से बोले - “मुझे शीघ्रातिशीघ्र रोम पहुंचना चाहिए ताकि मुझे इस सपने का अर्थ समझ में आ सके।''

मुरीदों ने उत्तर दिया, “हम भी आपके साथ चलेंगे।” शेख़ मान गये और यह धार्मिक काफिला मक्का से रोम की तरफ कूच कर गया। रोम में एक दिन शेख़ अपने मुरीदों के साथ यूं ही टहल रहे थे कि उन्हें एक सुन्दर मसीही कन्या दिखाई दी। उसके नैनों का तीखापन किसी को भी घायल कर सकता था। उसकी भौहों के कमान किसी को भी नतमस्तक कर सकते थे। काले नागिन जैसे बालों की लटों के बीच उसका मुखमंडल अंगारे की तरह दहक रहा था जिसने भी उसकी दीपक जैसी आंखों को देखा उसके दिल पर पलकों की छूरियां चल गईं। उसके चांदी जैसे गालों के गड्ढे में ग़ज़ब की कशिश थी, उसकी बातों में जीवन का रस था।

सुन्दरी ने अपने गोरे चेहरे से आधी नक़ाब हटाई तो शेख़ तड़प उठे और इश्क़ के हाथों ऐसे बेबस हुए कि अपना सारा अस्तित्व इस सुन्दरी के कदमों पर निछावर कर बैठे। उन्होंने

धर्म और सत्यता के अनमोल मोती की जगह अपमान और अपयश की कौड़ी के मोल बदल लिया।

मुरीदों ने शेख़ का यह हाल देखा तो दंग रह गये। उन्होंने हर प्रकार की तरकीबें लड़ाई कि शेख़ इस प्रेमजाल से मुक्त हो जायें पर भाग्य में कुछ और लिखा था। मुरीदों का किया कुछ काम न आया और शेख़ का रोग दिन दूना रात चैगुना बढ़ता गया।

रात को पल भर के लिए भी शेख़ की आखें बंद नहीं हुईं। उनके समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? वे व्याकुलता से सारी रात करवट बदलते रहे और आहें भरते रहे। “या खुदा! इस रात की भोर कब होगी- ऐसा लग रहा है कि आकाश की शमा बुझ गई है। मैंने इबादत में डूब कर  कैसी-कैसी पहाड़ जैसी रातें गुज़ारी हैं लेकिन ऐसी रात कभी नहीं देखी है जिसमें शमा की तरह सारी रात पिघलता हूँ और दिन भर मौत की पीड़ा से गुज़रता हूँ।''

रात क्या थी कयामत थी, शेख़ को ऐसा लगा कि सूरज सदा के लिए अस्त हो गया है और अब कभी भी उदय नहीं होगा। उनकी बेबसी का यह आलम था कि सब्र का दामन छूट चुका था, अक्ल उड़ चुकी थी, शरीर बेजान हो चुका था जिसमें इतनी भी ताकत नहीं थी कि वह अपने महबूब के घर तक जा सके । और कोई ऐसा दुख का साथी न था जो उनके दुख को समझता, उन्हें सहारा देता।

मुरीदों ने जब शेख़ की इतनी बुरी हालत देखी तो उन्हें तसल्ली देने लगे। हर आदमी अपनी समझ और अक्ल के हिसाब से राय देता, परन्तु शेख बड़ी दक्षता के साथ हर मशविरे को हर उपदेश को काट कर रख रहे थे।

एक मुरीद ने कहा कि “ऐ शेख उठिये और यह अपने इस अनमनेपन को दूर भगाइए।''

शेख़ ने उत्तर दिया कि “ए बेखबर! आज की रात मैं खूने जिग़र से बार-बार नहा रहा हूं।''

दूसरा मुरीद बोला, “हुजूर आपकी तस्बीह कहां है? बिना तस्बीह के आपका काम कैसे बनेगा?''

शेख ने कहा, “मैंने तस्बीह रख दी है ताकि मैं जनार (ईसाईयों के कमर की पेटी) बांध सकूँ।

एक और मुरीद ने कहा- “आप लज्जित नहीं हैं कि आपकी आत्मा में अब इस्लाम की एक किरण भी बाकी नहीं रह गई?''

शेख कह उठे, “इससे अधिक लज्जाजनक बात और क्या हो सकती है कि अभी तक मैं आशिक़ नहीं हुआ था।

किसी और ने कहा- “आपको सच में शैतान ने बहकाया है जो आप अपने को बदनाम करने पर तुल गये हैं।''

शेख ने कहा- यदि वास्तव में मुझे शैतान ने बहकाया है तो मुझे यूँ ही बहकाता रहे। अन्य मुरीद बोला, “चलिए आज की रात काबा लौट चलते हैं।''

शेख़ ने उत्तर दिया, “जिसे काबे में लोग बुद्धिमान कहते थे वह बुतखाने में आकर मस्त हो गया है तो अब न काबा सही न बुतखाना सही।''

जब शेख़ ने सबकी बातों को ठुकरा दिया तो सारे मुरीद थककर उनकी सेवा सुश्रुषा में लग गये कि देखें कब ईश्वरीय सहायता मिलती है।

अगले दिन शेख़ सनआन ने महबूब की गली में डेरा जमाया। गली के कुत्तों को गले लगाया, परन्तु दिल के दर्द का रोग ऐसा था कि चंद दिनों में ही सूख कर कांटा हो गये। पर मजाल जो महबूब के चैखट से अलग होते बल्कि उनके लिए उसकी पैरों की धूल सुरमें से कम न थी।

उड़ते-उड़ते इस घटना का समाचार उस सुन्दरी को भी मिला कि शेख़ सनआन उसके प्रेमजाल में फंसे हुए हैं और उसकी गली में आसन जमाए पड़े हैं, यह सुनकर उसने कटाक्ष किया, “आप जैसे धार्मिक महात्मा हम जैसांे के मोहल्ले में ठहरें?''

शेख़ ने कहा, “मेरी जान! यह नाज़ और नख़रे का मौका नहीं है, तू जिस तरह से चाहे मेरे इश्क़ को परख ले। मेरे ऊपर दया कर या फिर मैं तेरे क़दमों पर अपना जीवन निछावर कर दूं अगर कहे तो। तेरी चैखट पर अपनी जान दे दूं, मगर जान देने से प्रेम का हक़ अदा नहीं होता। तू ही बता कब तक तेरी चैखट पर सर पटकू? पलभर के लिए दरवाज़़ा खोल और मुझे अपना ले। माना कि मैं छाया की तरह व्याकुल हूं, परन्तु सूर्य की किरण बन कर तुझ तक पहुँचना चाहता हूं।''

लड़की ने तुनक कर कहा, “कैसे निर्लज्ज हो तुम! कब्र में पैर लटकाए बैठे हो और तुम्हारा यह समय क़फन व काफूर का है, प्रेम की बातें कर रहे हो! कुछ तो अपनी उम्र की लाज रखो! इन ठंडी आहों से तुम क्या मेरा साथ दे पाओगे। कहां तुम्हारी यह वृद्धा अवस्था कहां मेरा यह चढ़ता यौवन?''

शेख़ पर लड़की के व्यंगवाण का कोई प्रभाव न पड़ा। वह लगातार प्रेम का दम भरते रहे। आखिर एक दिन लड़की बोली, “शेख़ जी वास्तव में तुम्हारा प्रेम सचमुच सच्चा है तो सबसे पहले इस्लाम को अलविदा कहो और मेरे रंग में रंग जाओ, ताकी हमारे तुम्हारे बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव न रह जाए।''

शेख़ ने कहा, मैं हर हुक्म के लिए हाज़िर हूं, तब उस मसीही हसीना ने कहा तो यह चार काम करो, पहला बुत के आगे सर झुकाओ, कुरान शरीफ को जला दो, शराब पियो और इस्लाम

धर्म को भूल जाओ।

शेख़ सनआन ने चारों में से पहली शर्त शराब पीना स्वीकार कर ली। तो वह शेख को गिरजाघर ले गई और शराब से प्याला भर कर उन्हें पेश कर बोली, “लो पियो।”

शेख सनआन, वातावरण से प्रभावित और प्रियतम की अदाओं से मस्त हो चले थे, उन्होंने उन कोमल कर कमलों से जाम लिया और पी गये। एक ओर प्रेम का नशा दूसरी ओर शराब की मस्ती, शेख़ को कुछ याद न रहा न कुरान न हदीस की बातें, सब कुछ दिल व दिमाग से मिट चुकी थीं। यक़ायक़ शेख़ ने बढ़ कर प्रेमिका के गर्दन में बाहें डालीं।

सुन्दरी ने शेख़ के हाथों को झटका और दूर जा खड़ी हुई और कहने लगी- “यदि तुम्हारा प्रेम सच्चा है तो इस्लाम को छोड़ो और ईसाई धर्म को मानो। इसके बिना तुम इस नाजुक गर्दन में बाहें नहीं डाल सकते हो। शेख़ सनआन इश्क़ व शराब के सरूर में मस्त सब कुछ भूल चुके थे।

उन्होंने प्रेमिका की इस इच्छा का भी आदर किया। बोले- “मैं तैयार हूं, बुत को पूजने और कुरान को जला देने पर, शराब पीने और ईमान से मुँह मोड़ने पर यह देख कर लड़की ने कहा, “तो फिर आप मेरे सर्वस्व हैं और मैं आपकी दासी।''

ईसाईयों ने जब देखा कि शेख़ सनआन जैसे धार्मिक महात्मा ने उनका धर्म ग्रहण कर लिया है तो उनकी प्रसन्नता की सीमा न रही। वे लोग शेख को गिरजाघर ले गये उनकी कमर में जनार बांध वहां उनको ईसाई बना दिया। इसके बाद शेख़ ने अपना सूफी लबादा जला डाला और काबा से नाता तोड़ लिया। उस मसीही हसीना से प्रेम के कारण मूर्ति पूजा भी की। यह सब कुछ जब कर चुके तो प्रेयसी से बोले, “मैंने तेरे प्रेम में शराब पी, मूर्ति पूजा की, इस प्रेम में जो मुझ पर गुज़रा है वह किसी पर भी न बीता होगा। मैं लगभग पचास वर्ष सत्यता के मार्ग पर चलता रहा हूं और आध्यात्म के समुद्र में गोते लगाता रहा हूं परन्तु तुम्हारे प्रेम में इस्लाम को छोड़कर काफिर बन गया हूं, अपना चोंगा उतार कर यह कमरबन्द मैंने बांध लिया है, अब बता तेरे विरह में कब तक यूं ही तड़पता रहूंगा?

लड़की बोली, “फकीर बाबा! ठीक कहते हो, परन्तु मेरा जहेज तो बहुत अधिक है और तुम्हारी झोली खाली है यदि मेरा मिलन चाहते हो तो ढेर सारा सोना चांदी लाओ, वरना यूं ही ठण्डी आहें भरते रहो।''

शेख़ ने कहा, ए, लम्बे कद और चाँदी के बदन वाली हसीना! “तू हर पल नया बहाना ढूंढ़ती है और पिछला वायदा भूल जाती है तू जरा सोच तो मैंने तेरे प्रेम के कारण कैसे-कैसे कष्ट सहे हैं और कौन-कौन से बलिदान नहीं किये हैं और अब मैं तन्हा रह गया हूं। मेरे सारे मित्र शत्रु बन बैठे हैं। तेरी निष्ठुरता अपनी परम सीमा पर है और मित्रों का शुष्क व्यवहार का यह हाल है कि बता मैं क्या करूं, अब न दिल साथ देता है न दिमाग।''

शेख़ की बात सुनकर लड़की का दिल पसीजा, उसने कहा, “अच्छा! यदि तुम्हारे पास धन नहीं है तो साल भर तक मेरे सुअर चराओ, फिर उसके बाद हम दोनों विवाह के

गठबंधन में बंध जायेंगे।''

शेख़ सनआन ने हसीना की यह बात भी आखें बन्द करके मान ली और दूसरे दिन से ही सुअर चराने शुरू कर दिये। साथियों को जब शेख़ की इन हरकतों का पता चला तो सर पीट लिया और पूर्णरूप से शेख़ की तरफ से निराश हो गये। उन्होंने सोचा अब “ख़ान-ए-क़ाबा की ओर लौट चलें अब शेख़ के साथ रहने से कोई लाभ नहीं। आखिर एक मुरीद शेख के पास गया और बोला, “या तो आप हमारे साथ 'ख़ान-ए-क़ाबा' चलें या आज्ञा दें कि हम लोग मसीही धर्म को अपना कर उसके रंग में रंग जायें। हम कब तक इस कसमापुरसी की हालत में रहेंगे, अच्छा यही है कि ख़ान-ए-क़ाबा 'लौट जायें' शेख़ ने कहा “जब तक मेरी जान में जान है इस मसीही हसीना का प्रेम मेरा धर्म और ईमान है। लेकिन चूंकि तुम लोग मेरी पीड़ा नहीं समझते हो इसलिये मेरा साथ नहीं दे सकते हो। मेरी तरफ से मुरीदों से कह दो कि वह ख़ान-ए-क़ाबा लौट जायें और अगर मेरे बारे में वहां कोई पूछे तो कह देना कि शेख़ सनआन एक मसीही हसीना की जुल्फों की घनी छावों में डूबे अपना धर्म ईमान भ्रष्ट कर चुके हैं।

यह कह कर शेख़ ने मुरीद को विदा किया और सुअरों के बाड़े में चले गये और वे सारे मुरीद भरे मन से ख़ान-ए-क़ाबा की ओर लौट गये।

शेख़ सनआन का एक मित्र ख़ान-ए-क़ाबा में था। जब शेख़ यात्रा पर निकले थे तब वह वहां नहीं था। जब वह लौटा तो उसे पता चला कि शेख़ सनआन काबा छोड़ कर कहीं और चले गये हैं और जब उसने मुरीदों से पूछा तो उन्होंने उनकी प्रेमगाथा कह सुनाई और कहा वे केवल उसके दीवाने नहीं है बल्कि प्रेम में अन्धे हो रहे हैं। उसके कहने से उन्होंने शराब पी, मूर्ति पूजा की, इस्लाम छोड़ा और अब उसके सुअर चरा रहे हैं।''

शेख़ के मित्र को यह सब सुनकर बड़ा दुःख पहुंचा - उन्होंने मुरीदों को बुरा भला कहा कि तुमने खूब शेख़ का साथ निभाया। उन्हें ऐसे ख़तरे में अकेला छोड़ कर भाग निकले, तुम्हारा कत्र्तव्य था कि तुम भी उनके साथ कमरबन्द बांध कर मसीही धर्म ग्रहण कर लेते।

मुरीदों ने कहा, ''हम इसके लिए भी तैयार थे परन्तु शेख़ ने इसके लिए आज्ञा नहीं दी, उन्हें विश्वास हो गया था कि हमारी मित्रता व प्रेम की सच्चाई उन्हें दोबारा राह पर नहीं ला सकती है।''

वह मित्र बोला, “आओ! खुदा के आगे सर झुकाएं और शेख़ के लिए प्रार्थना करें।''

मुरीदों ने दोबारा रोम जाने की ठानी और वहां पहुंच कर एक गुप्त स्थान पर डेरा जमाया और चालीस दिन और चालीस रात तक शेख़ की सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना और उपासना करते रहे। न खाया, न पिया, न आराम किया। इस बीच पलभर के लिए भी उनकी आंख न झपकी, न उन्होंने चुल्लू भर पानी से शुष्क होते गलों को ही तर किया। परन्तु अन्त में खुदा ने मुरीदों की प्रार्थना सुनी और उनकी ओर कृपा दृष्टि डाली।

इस बीच शेख के मित्र को अपने अन्तरज्ञान से यह प्रतीत हुआ जैसे कि शेख़ अपनी भ्रष्टता और नीचता से ऊब गये हैं। उनके मन पर से कुफ्र की धूल उड़ चुकी है। मित्र खुशी की ताब न ला सका और मूर्छित हो गया। जब होश में आया तो उसने चमत्कार की बात मुरीदों को बताई कि उठो सूरज के चेहरे से नकाब गिर चुका है। खुदा का शुक्र अदा करो कि

अंधेरे को वापसी को रास्ता मिल गया है। सब रोते हुए शेख़ के पास पहुंचे तो देखा शेख़ ने वह कमरबन्द उतार फेंका है और मसीही वस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं और अधर्म के मार्ग को छोड़ कर इस्लाम के राह को अपना लिया है। हर प्रकार का अन्धकार का अन्त हो गया है और अब उन्हें क़ुरान और हदीस की सारी बातें दोबारा याद आ गई हैं। शेख़ को जब अपने दोबारा सत्य मार्ग पर लौटने का पता चला तो वह खुदा के आगे नतमस्तक हो गये। मुरीदों ने उन्हें सांत्वना दी, “आपने कुफ्र छोड़कर धर्म की राह को अपना लिया है, खुदा के आगे तौबा कर ली है।''

''खुदा आपकी तौबा को देखकर आपको माफ करेगा। वह दयावान है।

शेख़ ने अपना सूफियों वाला चोंगा पहना और मुरीदों के साथ क़ाबा की राह ली।

इधर जब वह मसीही हसीना सो कर उठी तो उसका हृदय सूर्य की तरह उज्ज्वल था। एक आकाशीय वाणी उसके कानों में गूंज रही थी कि “शीघ्र उठ और जाकर शेख़ का दामन पकड़ ले। तूने पहले शेख़ को अपनी राह पर लगाया था, अब जाकर शेख़ की राह अपना ले और उनकी जीवन साथी बन जा।''

हसीना इसी आकाशवाणी को सुनकर तड़प उठी, उसे किसी पल करार न था, आकाशवाणी ने उसकी कायापलट कर दी थी।

अब वह एक ऐसी राह पर थी जहां सब रास्ते पहुंच कर समाप्त हो जाते हैं, वह एक ऐसे संसार में थी जहां शब्द संवेदनाओं का साथ नहीं देते हैं।''

अब वह घमण्डी मसीही हसीना, विनम्रता की मूर्ति में ढल चुकी थी। जवानी के अल्हड़पन की जगह गम्भीरता ने ले ली थी। उसके दिल में तड़प थी, बस वह यही चाहती थी कि जैसे भी हो वह शीघ्रातिशीघ्र शेख़ के पास पहुंच जाये। वह पल-पल प्रार्थना करती जाती, “मेरे खुदा! मुझे माफ कर दे बिगड़ी को बनाने वाले। मैं एक बदनसीब, बेघर द्वार, बेसहारा, बेरहम औरत हूं। मैंने अनजाने में तेरे एक बन्दे को तुझसे छीना है मुझे माफ कर दे! मैंने जो भी किया है तू मुझे तुच्छ समझ कर मेरी तौबा कुबूल कर ले।

यह आश्चर्यजनक समाचार शेख के पास पहुंचा कि वह मसीही हसीना मसीही धर्म से मुँह मोड़ और इस्लाम की ओर आकर्षित हुई है। शेख मुरीदों के साथ उसके पास पहुंचे, देखा वह पीले चेहरे और दुख से निढाल है उसने कपड़े फाड़ डाले हैं उसकी अपने तन-बदन का होश तक नहीं है।''

लड़की शेख़ को देखते ही बेहोश हो गई। यह दृश्य देख शेख़ की आंखों से आँसू बह निकलें। लड़की को जब होश आया तो वह शेख़ के कदमों पर गिर गई और कहा कि उसे इस्लाम धर्म के अनुयाइयों में शामिल कर लें।''

मुरीदों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। लड़की ने जब इस्लाम कुबूल कर लिया तो शेख़ से बोली, “अब मैं अपने महबूब हकीकी से

अधिक समय तक दूर नहीं रह सकती हूं। मेरी ग़लतियों को क्षमा कर दें। यह कहकर वह मौत की नींद सो गई।

अफसोस, उसकी ज़िन्दगी का चांद गहना गया और उसने अपनी जान अपने रचयिता को भेंट कर दी। वह जब तक भ्रम के समुन्द्र में थी एक बूंद भर थी, परन्तु जब सच्चाई में मिल गई तो फिर समुन्द्र बन गई।

अनुवाद: फारसी लघुकथा

अपनी बारी

ईरान के किसी शहर में एक दर्जी रहता था। उसकी दूकान नगर-द्वार के समीप थी। दिन भर काम करता और साथ ही आस-पास की ख़बर भी रखता, उसकी एक विचित्र आदत थी। दूकान के दरवाज़े पर उसने कील ठोक कर एक मिट्टी की हांडी टांग रखी थी। जब कोई शहर में मरता और उसकी अर्थी गुज़रती तो वह दर्जी फौरन हांडी में एक कंकड़ डाल देता था। मास के अन्त में वह हांड़ी को ज़मीन पर उलट देता और कंकड़ों को गिन कर हिसाब लगाता कि महीने भर में कितने लोग मरे हैं।

इसके पश्चात् वह खाली हंडिया को फिर कील पर टांग देता और वही दुहराया गया कार्यक्रम फिर से आरंभ कर देता। यहां तक कि वह दिन आ गया जब दर्जी ने स्वयं आंख मूंद ली।

कुछ दिनों बाद एक आदमी दर्जी को तलाश करता हुआ आया। दूकान बन्द देख कर चकराया। काम जरूरी था। इस कारण उसने पड़ोसी से पूछा, 'भई यह दर्जी ने दूकान क्यों बन्द कर रखी है? कहां है? पड़ोसी बोला, 'दर्जी तो मिट्टी की हांड़ी में गिर गया है। -नासिरा शर्मा (काबूसनामा)