ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
सिक्का
July 24, 2020 • श्रीमती रश्मि रमानी • कहानी


श्रीमती रश्मि रमानी, इंदौर. म.प्र., मोबाईल नं. 9827261567

अलमारी साफ़ करने के लिये, वसुंधरा ने जैसे ही सामान के नीचे बिछे अख़बार सहित सामान को निकाला तो, नीचे ज़मीन पर कुछ गिर पड़ा. झुककर उठाया तो रूमाल में कुछ बँधा हुआ था, खोला तो एक रूपये का सिक्का था, वसु सिक्के को देखते ही पहचान गई, रूमाल में बँधा सिक्का भले ही और सिक्कों के जैसा ही था, पर कुछ तो बात थी, जिसके कारण ये सिक्का और सिक्कों से अलग था।

वसु जब भी इस सिक्के को देखती है, उसे बीते दिन याद आने लगते हैं, आज भी उसे याद आया कि बचपन में कैसे जब 'उनकी' टोली, गली मुहल्ले में आती थी तो, हलचल होने लगती थी, उनकी टोली में जो सबसे छोटा और कमसिन–सा होता था, उसके हाथ में ढोलक होती, और सबसे बड़ा खाली हाथ, वह उनका नेतृत्व-सा करता प्रतीत होता था। जैसे ही किसी के घर से गाने बजाने की आवाज़ आती तो, लोग समझ जाते कि वे आये हैं. बच्चों में कानाफूसी होने लगती, वे एक दूसरे को ख़बर देने दौड़ पड़ते, जिस भी घर में वे घुसते थोड़ी देर के बाद उस घर से ढोलक और घुघरूओं की आवाज़ के साथ नाचने-गाने की आवाजें आने लगतीं, बुजुर्ग महिलाएं तटस्थ भाव से बैठी रहतीं, बहुएं कोने में सिमटी रहतीं, घर के पुरूष तो उनके रहने तक पता नहीं कहाँ गायब हो जाते, वैसे भी दोपहरी में अक्सर पुरूष घर में नहीं होते थे, और अधेड़ औरतें जो अक्सर उनकी सासें होती थीं, वे ही उनका सामना करती थीं, नेग देने में थोड़ी ना-नुकुर करतीं, पर उनकी ढिठाई के आगे उनकी एक न चलती, बड़ी जल्दी जैसे ही उनके हाथों में नोट धरे जाते, उनके मुँह से आशीर्वादों की झड़ी लग जाती. जो कुछ इस प्रकार होते–'तेरा लाल जुग जुग जिये, लाट कलट्टर बने, तू झूले में झूले, खूब फले-फूले, जोड़ी बने रहे, सदा सुहागिन रहे, सात बेटे जने.' वसु को समझ में नहीं आता था कि मुहल्ले में जैसे ही किसी के घर बच्चे का जन्म होता तो, कुछ ही दिनों में वे बिना ख़बर किये, कैसे अपने आप आ जाते, और शादी-ब्याह की सूचना उन्हें कौन देता था, जो वे वहाँ भी आ धमकते, एक-डेढ़ घण्टा नाच'-गाकर, नई साड़ी, अनाज और शगुन के रूपये लेकर ही विदा होते थे, जिन शिशुओं को माँएं छोटे बच्चों को उठाने नहीं देती थीं, वे बेहिचक उन्हें दे देतीं, और वे उन्हें लेकर बधाई गीत गाते, लोरी सुनाते, लंबी उम्र का आशीर्वाद देकर, थोड़ी देर में पता नहीं कहां गायब हो जाते. सत्तर-अस्सी के दशक में दीवारें परिवार नियोजन के नारों-पोस्टरों से पटी हुई थीं, पर क्या मजाल जो लोगों पर उसका असर हो, घर-घर में जब पाँच–सात बच्चे होना आम बात हो तो, आये दिन उनके आने में कैसा आश्चर्य ?

उनके जाने के बाद, देर तक उनकी चर्चा चलती रहती कि कैसे उनकी दुआओं में असर होता है, जो अनाज उन्हें दिया जाता, उसमें से थोड़ा-सा वे लौटा देते जिसे वापस घर के उसी अनाज में यह मानकर मिला दिया जाता कि इससे घर में बरकत होगी. किसी-किसी को वे अठन्नी-चवन्नी भी दे देते जिसे शुभ माना जाता. ऐसी सोच थी कि जिसे वे बद्दुआ दे दें वह बर्बाद हो जाता है. क्या सचमुच ऐसा होता था ? वसु को याद आया कटारिया सेठ के बेटे की शादी में जब वह पति के साथ जा रही थी तो, वे नेग कम मिलने के कारण सेठ को गरियाते हुए आ रहे थे. गालियों की अश्लीलता के कारण पति-पत्नी दोनों झेंप गये थे. तो क्या यह उनकी बद्दुआओं का असर था जो, सिर्फ तीन महीनों में ही राजीव कटारिया का नीता से तलाक हो गया था. पति के साथ अमेरिका जाने पर नीता को पता चला था कि राजीव की अमेरिकन पत्नी पहले से ही वहाँ मौजूद है, एम.एस.सी. पास तेज़-तर्रार नीता तत्काल भारत लौट आई थी, और तलाक के केस में उसने ससुराल वालों को दिन में तारे दिखा दिये थे।

तमाम कौतूहल के बावजूद उनके बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता था. कुछेक माँएं ऐसी भी थीं जो, अपने बच्चों को यह कहकर डराती थीं कि वे लड़कों को उठाकर ले जाते हैं, और अपने जैसा बना देते हैं, पर मुहल्ले में तो कभी किसी का बच्चा गायब नहीं हुआ था, नंदू ज़रूर गुम हुआ था, पर वह तो दो दिन बाद वापस आ गया था, पता चला बाप ने मारा था तो, दोस्त के साथ उसके मामा के गाँव भाग गया था. उनकी विचित्र आवाज़, जोर की तालियां, चटक-मटक पहनावा और मेकअप बहुत अजीब लगता था, शायद यही कारण था कि लोग उनसे थोड़ी दूरी बनाकर ही चलते थे, बल्लू चाचा उनसे पता नहीं कैसे टकरा गये थे, अनजाने में या जानबूझकर कोई नहीं जानता था, पर गली में जो शोर मचा था उसके चटखारे सबने लिये थे, साड़ी को उसने दोनों हाथों से पकड़कर अभी सिर्फ घुटनों तक ही उठाया था कि शर्म से पानी-पानी होकर बल्लू चाचा मुँह छिपाकर भागे थे. गालियों की शुरूआत एक से होकर सामूहिक हो गई थी, पर सब सुनते रहे थे, कोई कुछ नहीं बोला, थोड़ी देर बाद वे पता नहीं कहाँ चले गये।

वसु को बरसों तक सिर्फ इतना पता था कि उन्हें हिजड़ा कहते हैं, वह भी दबी ज़बान में, किन्नर शब्द का चलन तब नहीं था। टी.वी. भी बहुत बाद में आया। महाभारत में द्रौपदी के भाई शिखंडी का त्रासद चरित्र पढ़कर, मुग़ल इतिहास में उनके लिये प्रयुक्त ख़्वाजासरा शब्द का अर्थ जानकर, कुंवारा बाप, अमर, अकबर, एंथनी, जोधा-अकबर जैसी फिल्मों के ज़रिये वसु ने उन्हें मनोरंजन के पात्रों के रूप में देखा, फिर एक दिन डिस्कवरी चैनल पर उनके बारे में बनी डॉक्यूमेंट्री देखी तो काफ़ी कुछ जानकारी मालूम हुई. अख़बार में उसने उनके डेरे के बारे में पढ़ा, जहाँ उनका समूह रहता था. धीरे-धीरे उनका आना कम और नाच-गाना बंद होता गया. अब वे बच्चों के जन्म और शादी के बाद, साल में दो-तीन बार त्यौहारों पर आते और नेग लेकर चले जाते. वसु अक्सर सोचती वे कैसा जीवन जीते होंगे ? हर समय तो कोई भी गहने पहने, मेकअप से सना, हँसी-ठिठोली तो नहीं ही कर सकता न. 1 क्या इन्हें अपने घर-परिवार, माँ-बाप याद नहीं आते होंगे, इन्हें किसी अपने के साथ की तलब महसूस नहीं होती होगी ? उनके आने पर वसु स्वयँ को भयग्रस्त अनुभव करती थी, पर उनके बारे में उसकी उत्सुकता कम नहीं होती थी. ट्रैफिक सिग्नल पर गाड़ी रूकने पर या ट्रेन में जब उन्हें भीख मांगते देखती तो चुपचाप दस का नोट आगे बढ़ा देती.

समय बदल रहा था, जबलपुर चुनाव में शबनम मौसी की जीत ने वसु को वेलकम टू सज्जनपुर के किन्नर प्रत्याशी की याद दिलाई तो इंडिया टुडे में उसने सौंदर्य प्रतियोगिता में विजयी प्रतिभागी का फोटो देखा, एक दिन टी.वी. पर उसने एक ऐसी ही सौंदर्य प्रतियोगिता में विजयी प्रतिभागी का साक्षात्कार देखा तो इनके प्रति समाज के बदलते रवैये को देखकर अच्छा लगा।

सिक्के को रूमाल में वापस बाँधकर, अलमारी में रखते समय, वसु को याद आया बरसों पहले एक बरसाती दोपहर में डोरबेल बजने पर, जब उसने दरवाजा खोला तो सामने एक उम्रदराज़ हिजड़े को खड़ा पाया, मेकअप धुल गया था, साधारण से कपड़े भी गीले हो चुके थे, –'राखी का नेग देना', खनकती आवाज़ में उसने कहा. वसु डर गई थी पर उसे पता था, ये लोग चोरी नहीं करने की शपथ लिये रहते हैं, अंदर जाकर, पर्स मे सौ का नोट निकाला, बिस्कुट के एक पैकेट के साथ उसने जब उसकी ओर बढ़ाया तो आंखों में हल्की-सी नमी के साथ चेहरे पर खुशी की चमक आ गई थी, नोट को मज़बूती से पकड़कर उसने ब्लाउज़ में से छोटा-सा बटुआ निकाला, उसमें नोट डालकर एक रूपये का सिक्का निकालकर वसु की हथेली पर यह कहते हुए धर दिया था-'तेरा भी भला हो, भंडार भरा रहे।'

वसु को पता था न ये लॉटरी का टिकट है, न छप्पर फटने की गारंटी, मन मे ये भी आया कि भीख में मिला सिक्का कैसे बरक़त दे सकता है ? पर वे आंखें, उसके शब्द, उसका लहजा कोई तो बात थी जो वसु ने एक नये रूमाल में सिक्के को बांधकर इस विश्वास के साथ अलमारी में सम्हाल कर रख दिया था कि और कुछ हो न हो दुआओं में सने इस सिक्के में उसके भले की कामना तो थी ही, और इस स्वार्थी दुनिया में कितने लोग हैं जो किसी का भला चाहते होंगे..... ?