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सोल्जर
October 6, 2020 • निशीगंधा • कहानी


निशीगंधा, वसंतकुंज, नई दिल्ली, मो. 9810957504

 

छीज गई कोमल काया

मिला प्रलाप जीवन भर का

तन छीजा, मन भी छीजा

जीवन में क्या-क्या छीजा।

बरसों बाद उससे मिलने मैं उसके घर जा रही थी। बीता हुआ कल रह-रह कर मानस पटल पर दस्तक दे रहा था। आलिया बहुत खूबसूरत थी। गोरा रंग, भूरी आंखें, कंधों पर झूलते घुंघराले, सुनहरे केश, तीखे नक़्श और कोमल काया। जीवन में कितनी खुशहाली थी। आलिया और जाॅय ने मिल कर शिमला की खूबसूरत वादियों में घर सजाया था। भव्य, गरिमामयी जीवन शैली थी। सुरभ्य पहाड़ी इलाके की ऊँची-नीची सड़कों पर उन दोनों को बच्चों के साथ तेज़ रफ्तार से इधर-उधर आते-जाते देखा जा सकता था। वे दोनों ही हर खेलकूद, आइस स्केटिंग व स्कीइंग के चैंपियन थे। आलिया स्कूल में प्राध्यापिका थी और जाॅय भी किसी बड़ी कंपनी में ऊँचे ओहदे पर था। पर कहते हैं न, बुरी तो एक घड़ी ही काफी होती है जीवन को त्रासदी में बदलने के लिये।

उस रोज़ सुबह-सुबह आलिया, बच्चों को तैयार कर बड़ी हंसी-खुशी घर से निकली थी। मन में खुशी थी; हर साल की तरह स्पोर्ट्स चैंपियनशिप उनके स्कूल को ही मिलेगी। अच्छी तैयारी थी उनकी। अच्छी ट्रेनिंग देने के साथ-साथ बच्चों को प्रोत्साहन देने के लिये वह उनके साथ हर खेल में भाग भी लिया करती थी; विशेषकर स्कीइंग में।

वर्षों से मैं उससे मिली तो नहीं पर दोस्तों से बहुत कुछ सुन रखा था उसके विषय में। जाने कैसी दिखती होगी आज? रह-रह कर उसका कमनीय चेहरा मेरी आँखों के आगे आ रहा था। उसके यहाँ पहुँच काफी देर तक बड़े कमरे में बैठ मैं उसका इंतज़ार करती रहीं थीं। आया ने आकर बताया मैडम थोड़ी अस्वस्थ हैं, कुछ ही देर में आपसे मिलने आ जायेंगी। आप बैठिये। मैं आपके लिये काॅफी लाती हूँ। आया थोड़ी देर बाद काॅफी टेबल पर रख गई। मुझे लगा शायद उसकी तबियत ज़्यादा खराब है इसीलिए उसे बाहर हाल में आने में समय लग रहा है। मुझे लगा मुझे उससे बिना मिले ही चले जाना चाहिए। मैं उठ चलने को हुई तो भीतर से हल्की कराहने की आवाज़ें सुन मैं वहीं बैठ गई। वह रह-रह कर कराह रही थी जैसे उसके शरीर में चीसें पड़ रही हो। चीसें उसके शरीर में पड़ रही थीं और न जाने क्यों आह मेरे दिल से निकल रही थी। करीब दस मिनिट बाद द्वार पर लगा पर्दा हटा और अपनी व्हील चेयर को अपने हाथों से संचालित करते हुए वह कमरे के भीतर आ गई। चेहरा दर्द से लिप्त था फिर भी उसके भीतर आते ही कमरे में जैसे एक प्रकाश सा फैल गया। चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान बनी रहे इसका वह पूरा प्रयास कर रही थी। फिर मुझसे मुख़ातिब हो वह पूछने लगी, ‘‘कहिये कैंसी हैं आप? उस रोज़ फोन पर तो बात हुई थी आप से। यहाँ तक पहुँचने में कोई मुश्किल तो नहीं हुई ? घुमावदार पहाड़ी इलाका है न’’ मुझसे बात करते-करते उसका दर्द से ज़र्द हुआ चेहरा गुलाबी होता जा रहा था। पर जैसे ही मेरी नज़र उसके पूरे शरीर पर पड़ी मैं देख कर सन्न रह गई।

एक ही जगह पर बैठे रहने से शरीर तो भारी-भरकम हो ही गया था साथ ही शरीर का निचला हिस्सा, पाँव, टाँगें आदि एकदम विकृत हो चुके थे। भयंकर सूजन तो थी ही पर नसें ऐसी थीं कि जैसे अभी फट जायेंगी। कहीं-कहीं से हल्का खून भी रिस रहा था। वह अपने शरीर पर जगह-जगह मलहम व रूई के फाहें लगा कर ही बाहर आई थी। उसे दर्द में देख मैं स्वयं उसकी पीड़ा बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। पर इतने दर्द में भी उसकी मुस्कुराहट बता रही थी उसमें दर्द को बर्दाश्त व जज़्ब करने की कितनी शक्ति थी। उसे देख कर मैं समझ पा रही थी वह वर्षों से केवल जज़्ब और जज़्ब ही करती आई थी।

यूँ उसे देख मुझे लग रहा था। वक्त के साथ उसके घाव भरे नहीं थे। आज भी उसका रोम-रोम टीस रहा था और अपनी नम आर्द्र आँखों से जैसे वह अपनी कहानी बिन कहे ही मुझसे कहे जा रही थी। मैं वहाँ एक पत्रिका के लिये उसका इंटरव्यू लेने गई थी। उसे देख मुझे लगने लगा मुझे उससे कुछ भी पूछने की आवश्यकता नहीं थी। उसके हाव-भाव व उसकी अवस्था ही उसकी सारी व्यथा-कथा कह रहे थे। वह वर्षों से ऐसा जीवन जी रही थी। अपनी अव्हील चेयर के साथ स्वयं को उस घर की चार दीवारी में कैद करते हुए। वह कैद उसने उसी दिन स्वीकार ली थी जिस दिन बर्फ की वादियों में, मन में स्पोर्टस चैंपियन शिप जीतने की उत्कट अभिलाषा लिये हुए बच्चों के साथ स्कीइंग करते हुए वह स्वयं को संभाल नहीं पाई थी और अप्रत्याशित दुर्घटना का शिकार हो गई थी। उस दिन के बाद से उसने स्वाभाविक जीवन कभी जिया ही नहीं।

उस एक पल के हादसे ने सब कुछ तहस-नहस कर डाला था। उस वक्त वह शायद केवल पैंतीस-छतीस वर्ष की रही होगी। आज उम्र के पचास बसंत पार कर चुकी थी। क्या कुछ नहीं भोगा होगा उसने इतने वर्षों। किस-किस तरह से संभाला होगा स्वयं को, बच्चों को, घर को, पति को व अन्य सगे सम्बन्धियों को। जाॅय व अन्य सम्बन्धियों ने बहुत कुछ किया था उस वक्त उसके लिये। पर वक़्त के साथ अनेक रिश्तों पर प्रश्न चिन्ह लगना लाज़िमि था। हर रिश्ते के व्यवहार में इतना परिवर्तन आ जायेगा आलिया ने कभी सोचा न था। जाॅय के लिये भी उम्र का तकाज़ा तो था ही और आलिया के लिये जीवन तो फिर कभी सामान्य हुआ ही नहीं। दुःखों का पहाड़ टूट गया था उसके परिवार पर। तन की पीड़ा-संभालती तो मन की पीड़ा उभर आती। इन वर्षों कितनी ही बार मानसिक संतुलन खोया था। परिस्थितियों से यूँ जूझना पड़ेगा उसने कभी सोचा ही न था। मैं सोच में थी ऐसे हालातों में उस वक्त किसने की होगी उसकी सेवा-सुश्रुषा। किसने उसके मन को समझा होगा और सांत्वना के दो बोल बोले होंगे।

मैं न जाने क्यूँ वहाँ बैठे-बैठे उसके वर्षों के दर्द को समझ उसके दर्द के साथ आत्म-सात होती जा रही थी। शायद स्त्री होने के नाते उसके बिन कुछ कहे ही उसके हृदय की बात मेरे हृदय तक पहुँच रही थी। कैसे वह अपने ही जीवन की एक मूक दर्शक बन कर रह गई थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने होता आया था और वह कुछ भी नहीं कर पाती थी। बर्दाश्त और ज़ब्त, उस पर से कर्तव्य, कर्म किसी तपस्या से कम नहीं था उसका जीवन। पहाड़ सी पथरीली, चोटीली जिंदगी की चढ़ाई कैसे उसने अकेले सिर्फ उस व्हील चेयर के सहारे की होगी। साथ ही जिं़दगी का इतना बड़ा बोझ कैसे वह अपने सशक्त कंधों पर जिन्हें वह स्वयं कमज़ोर समझती थी पर वर्षों उठाती आई थी। बहुत कुछ ऐसा भी रहा होगा जीवन में जिसे वह वर्षों अपने हृदय में दफ़न कर बर्दाश्त करती रही होगी पर उन बातों का क्या करती जो प्रत्यक्ष सबके सामने हो जाया करती थीं। उफनते दूध की सी स्थिति; जिसे शांत करने के लिए अपने ही हाथ जल जायें। बर्दाश्त और फिर और बर्दाश्त जिसकी हदें शायद सिर्फ वही जानती थी।

उससे इधर-उधर की बातें करते हुए मैं उसकी परिस्थितियों को समझने का प्रयत्न करती रही। वर्षों पूर्व दुर्घटना के पश्चात् कैसे उसने हालात से समझौता कर स्वयं को परिस्थितियों के अनुरूप ढाला होगा। संघर्ष ही तो था जीवन का और अस्त्र-शस्त्र के रूप में उसे मिला भी तो क्या ? एक व्हील चेयर। और अपने जीवन के संघर्ष के लिये व दुःख-दर्द को परास्त करने के लिये उसने उस व्हील चेयर को ही अपना कार्य-क्षेत्र बना लिया था। उसके गिर्द अनेक आयोजन कर मोटे कैनवस व धातु से अनेक जेब व खाँचें कस लिये थे। और रसोई से लेकर घर की हर ज़रूरियात की चीज़ों को सुनियोजित कर वह उनमें रखती ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह स्वयं सिद्ध हो। जीवन संघर्ष से जूझने के लिये जैसे अपने गिर्द एक युद्ध पोत तैयार कर लिया हो। यह तैयारी उसकी बरसों की समझ थी। अपनी अक्षमताओं के रहते वह आज भी किसी पर निर्भर नहीं थी और फुर्ती ऐसी कि देखते ही बनती थी। मेरे सामने ही इतनी पीड़ा में होते हुए भी वह कितनी बार अपनी व्हील-चेयर को तीव्र गति से इधर-उधर ले जा घर के सभी काम एक-एक कर सम्पन्न करती रही। रफ्तार में तो कमी नहीं थी पर दिल की बातें तो दिल ही जाने। उसके हृदय भीतर- क्या-क्या घुमड़ता होगा कोई कैसे जान सकता था। केवल उसकी पीड़ा से नम हो आई बड़ी-बड़ी आंखें व लाल डोरे बहुत कुछ कह रहे थे। उसके जीवन जीने के सलीके को देख वहाँ बैठे-बैठे मैं बहुत कुछ ग्रहण कर रही थी और मुझे बहुत कुछ सीखने को भी मिल रहा था। आत्म निर्भर हो कैसे अपनी अक्षमताओं को परास्त कर उसने अपने जीवन को समाप्त नहीं होने दिया था। परिवार में किसी से कोई अपेक्षाएं नहीं रखीं। पूरा ध्यान बच्चों ने घर की खुशी पर केन्द्रित कर इतने वर्ष बिता दिये। ज़िंदगी कितनी ही बार बंद मुट्ठी से रेत की तरह छुटती भी गई पर किसी से कोई शिकायत नहीं की। या कहो शिकायत कर नहीं सकती थी। उसकी विवशताएं सामने आ जातीं। अनेकों बार मानसिक संतुलन खो फिर से स्वयं को संतुलित कर सब संभालती थीं। पहले वाली आलिया तो कहीं थी ही नहीं। तन से निरीह हो गई पर आत्मा ने बल दे उसे हार कर टूटने नहीं दिया।

कितने-कितने दिन अकेली रही होगी। जाॅय का जाॅब उसे अक्सर विदेश ले जाता और अपनी असमर्थताओं के रहते अपनी व बच्चों की सुरक्षा के लिये उसने स्वयं को कैसे-कैसे तैयार किया होगा। इतनी बड़ी चोट व बदलती परिस्थितियों ने उसे समझदारी से अनुशासन में रहना सिखा दिया था। वह समझ गई थी जाॅय को वह पहले जैसा सुख कभी नहीं दे पायेगी फिर वह उससे वफा की दरयाफ्त आखिर कब तक कर पायेगी। बस एक चुप लगा ली। कभी भी जाॅय से कोई प्रश्न नहीं किया। वह समझ गई थी अपने जीवन की चढ़ाई उसे अपने अपंग शरीर के साथ अकेले ही करनी थी।

उसे यूँ अपनी अक्षमताओं व परिस्थितियों से संघर्ष करते देख मेरे मस्तिष्क पटल पर एक ही शब्द कौंधा... वह था ‘सोल्जर’। सच, वह मुझे किसी सोल्जर से कम नहीं लग रही थी। अपंग होते हुए भी कैसे वह संपूर्ण थी और जीवन में आये संघर्षों से मुकाबला करने के लिये किसी ‘सोल्जर’ के जैसे ही सक्षम। वह मुझे सही मायने में एक ‘सोल्जर’ ही लगी।

चलते वक्त चाहते हुए भी मैं नहीं कह पा रही थी, ‘‘आप जल्द स्वस्थ हो जायेंगी।’’ ऐसा संभवतः संभव नहीं था। उसका रोग लाइलाज हो चुका था। वह कई वर्षों से इसी अवस्था में थी। जब तक जीवन है वह ऐसे ही रहेगी। अब तो केवल उसका मनोबल ही उसे जीने के लिये बल दे सकता था।

मैं चलने को हुई, तभी जाॅय ने कमरे में प्रवेश किया। भीतर आते ही आलिया से कहा..... बाहर घूमने चलें। फिर मेरी ओर मुखातिब हो पूछने लगे..... आप चलना चाहेंगी हमारे साथ। जाने क्यों जाॅय को देख मुझे लगने लगा शायद यही एक आशा की किरण बची थी उसके जीवन में। उन्हें देख कर लग रहा था आज भी वे एक-दूसरे के प्रति कर्तव्य निष्ठ थे। जीवन राह पर चलते-चलते जो भी अच्छा बुरा रहा होगा उसे भुला वे दोनों ही भविष्य के सपने संजो रहे थे; कुछ अपने लिये, कुछ बच्चों के लिये। उन दोनों को यूँ साथ में देख यही लग रहा था जैसे उन दोनों के बीच एक बहुत अच्छी व बहुत ‘खूबसूरत समझ हो। यूँ मुझे जाॅय का भीतर आ कर आलिया से पूछना, ‘‘बाहर घूमने चलें’’। बहुत अच्छा लगा।