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स्त्रियाँ और योग
March 1, 2020 • इन्दिरा मोहन • लेख

अधिकतर जीवन के दुखों का कारण अज्ञान है। स्वयं अपने तथा जगत के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान होने पर शोक कम होता चला जाता है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाने पर, तदानुसार आचरण करने पर दुख क्षीण होते हैं और परम शान्ति के आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। वसिष्ठ जी के अनुसार इस सद्मार्ग पर चलने का सभी को अधिकार है, चाहे वे ब्राह्मण हों या शूद्र, देव हो या दैत्य पुरुष हो अथवा स्त्री। यहाँ कोई भेदभाव नहीं है। यही नहीं योग वासिष्ठ के पढ़ने से तो ऐसा मालूम पड़ता है कि योग-साधन में स्त्रियों को शीघ्रतया सफलता हो सकती है, वे पुरुषों से अधिक तीव्र बुद्धि एवं लगन वाली होती हैं। वे जिस बात को ठान लेती हैं उसको सिद्ध किए बिना चैन नहीं लेतीं। लीला और चूडाला के उपाख्यान इस विषय में प्रमाण हैं। लीला ने सरस्वती की (जो स्वयं स्त्री थी) उपासना द्वारा जन्म-मृत्यु का सारा भेद जान लिया था। त्रिकालदर्शी होने से वह भी ब्रह्माण्डों, लोकों में जा सकती थी, उसने अपने मृत पति को अन्य लोकों से बुलाकर जीवित किया। शिखिध्वज राजा की विदुषी एवं व्यवहार कुशल रानी चूडाला ने, पति के वन-गमन पर स्वयं राज्य-पाट करते हुए अपने पति से पूर्व आत्मज्ञान प्राप्त कर, प्रच्छन्न वेष से वन में जाकर उसे ब्रह्मज्ञान और जीवन्मुक्ति का उपदेश देकर जीवनमुक्त बना दिया। इन दोनों उपाख्यानों में योगवासिष्ठ के सारे सिद्धान्त आ जाते हैं। वैराग्य-प्रकरण में संशयग्रस्त रामचन्द्र जी द्वारा स्त्री-निन्दा की गई है जो वसिष्ठ जी का मत नहीं हैं। वहाँ पर भी, उन्हीं स्त्रियों की निंदा है जो विषय-भोग, काम-वासना को जीवन का लक्ष्य मान, पुरुषों को अपने मोह-जाल में फंसाती हैं। जबकि अच्छे कुल की सुशील ज्ञानवती स्त्रियाँ अपने पतियों को संसार-सागर से पार उतारने में पूर्ण सहयोग देती हैं। उनके सम्बन्ध में योग-वसिष्ठ में कहा गया है-

मोहदनादि गहनादनन्तहनादपि।

पतितं व्यवसायिन्यस्तारयन्ति कुलस्त्रियः निपू । 09/25

अर्थात् अच्छे कुलों की प्रयत्नशील स्त्रियाँ मनुष्यों को अनन्त और अनादि गहरे मोह से पार कर देती हैं।

सखाभ्राता सुहृदभृत्यो गुरुर्मित्रं धनं सुखम्।

शास्त्रमायतनं दासः सर्वं भर्तुः कुलांगना।। निपू । 09/27

कुलीन स्त्रियाँ अपने पति की सखा, बन्धु, सुहृद, सेवक, गुरु, मित्र, धन, सुख, शास्त्र, मंदिर, दास आदि सब कुछ होती हैं।

योगवासिष्ठ के अनुसार- संसार में सब आनन्दों से बढकर समभाव का सुख है जो कि समान मनोवृत्ति वाले दम्पति को एक दूसरे के सान्निध्य में प्राप्त होता है।