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तरंग
July 24, 2020 • प्रबोध कुमार सान्याल • कहानी

बंगला से अनुदित, जो याद रहगई कहानियों में से एक अनुवादक गोपाल चन्द्र दास वाराणसी

इतनी रात गये ट्रेन बदलना भी एक मुसीबत है। एक बड़ा बक्स, दो सूटकेस, पहाड़ जैसा बिस्तर, -दो लालटेन, टिफिन-कैरियर, सुराही, दूध की बोतल-क्या नहीं है ? उनींदी आँखों वाले तीन बच्चों को उतारना, उस पर कातिक की नयी ठंड,-घर से इतनी दूर पच्छिम में चेंज के लिये जाने में है बड़ी दिक्कत।

'ठहरो, बहादुरी न करो, पहिले गाड़ी तो रुके। अरी मैया, बाहर तो कुछ भी नहीं दीखता। पहिले रात, फिर इतना कुहरा,-रोशनी भी नहीं दिखाई देती। बाँध डालो बिस्तर को किसी तरह। क्यों जी, कुली तो मिलेंगे ?'-कपड़ों को सँभालते हुए शैलबाला ने पति की ओर देखा।

भूपति ने कहा-'जलवायु के बदलने से तुम्हारा शरीर तो बहुत चंगा हो गया है, बचा दो न कुली का खर्च।'

शैलवाला हँसते हुए बोली-'तुम्हारा यह पांच मन का लगेज क्या मुझी से-?'

'क्या हर्ज है ?'-भूपति बोला, 'बंगाल की लड़की तो पच्छिम में जाकर मरद बन जाती हैं। तुमसे इतना भी नहीं होगा ? अच्छा, मैं मदद कर दूंगा कुछ।'

'तुम ?'-शैलबाला बोली, 'तुम्हें तो बुखार है न ? अच्छी तरह रैपर ओढ़कर उतरो तुम। मिन्टू का हाथ पकड़ो, वेणु खुद उतर जायगी, अंजू को मुझे दो। ओह ! पहिले गाड़ी तो एकदम रुक जाय। वक्त क्या होगा ?'

'बारह बज रहे हैं।' 'हम लोगों को फिर गाड़ी कब मिलेगी ?' 'करीब अढ़ाई बजे।'

शैलबाला ने कहा-'बाबा बड़ा डर लगता है। बुखार में अगर ठंड लग गई तो क्या होगा ? बेटिंग-रूम तो है यहाँ ?'

भूपति ने कहा-देवी, 'तुम हो गयी हो पति-भक्ति में अन्धी। कोई स्टेशन देखा है वेटिंग-रूम के बिना ?'

- झटके के साथ गाड़ी स्टेशन पर रुकी। इतनी रात होने पर भी यात्री, कुली या फेरीवाले---किसी की कमी नहीं। गाड़ी रुकते ही तीन-चार कुली दरवाजे पर आ गये। शैलबाला ने पति के गले में, कानों को ढकते हुए, मफलर लपेटा और फिर उन्हें गाड़ी से नीचे उतरने की आज्ञा दी। _बड़ी जबरदस्त स्त्री है शैलबाला। एक बच्चे को गोदी में लिया, दूसरे का हाथ पकड़ा, एक आंख पति पर रक्खी, दूसरी लगेज की तादाद पर-फिर उपस्थित जनता की तनिक भी परवा न करके, शोरगुल मचाती हुई वह ट्रेन से उतरी। - बड़ी लड़की वेणु का हाथ पकड़कर भूपति उतरे। दो कुलियों ने सामान उठाया।

करीब अढ़ाई घंटा समय बिताना होगा। इस लंबे समय को काटने के लिये ठीक-सी जगह चाहिये। शैलबाला ने कहा-मैं औरतों के वेटिंग-रूम में नहीं रहूँगी। तब तुम्हारी देख-भाल कौन करेगा ? चलो, मर्दाने रूम में,-पहिले तीनों बच्चों के सुलाने का इन्तजाम कर दूं। बड़ी ठंड है, चलो, चलो-ए कुली, इधर आयो। कहाँ हो जी, तुम ?' - भूपति बोला-'यहीं तो हूँ। बड़ी जल्दीबाजी करती हो। सब्र नहीं कर सकती थोड़ा भी!

'सब्र कैसे करूँ ? क्या तुम बीमार नहीं हो ? भले-भले घर पहुँच जायँ तो जान बचे। ए कुली, इधर लाओ सामान। भीतर यहाँ।' फिर धीरे से शैलबाला बोली-'अरे, देखो तो यह आदमी कौन है ? तब से घूम रहा है मेरे आसपास।' - भूपति ने देखकर कहा-'कुछ नहीं। इतना गहना, इतना रूप, उसका क्या दोष अगर देखता भी हो।'

'कैसी बढ़ेंगी बातें करते हो ! रात में डर लगता है तभी कहा,' शैलबाला बोली।

'तुम्हें देखकर डाकू भी डर से भाग जायेंगे।' 'क्यों?' 'सोने की चोट ही न सह सकेंगे बेचारे!'

वेटिंग-रूम मे जाकर कुलियों ने सामान उतारा। भूपति ने कुलियों से अढ़ाई बजे की कलकत्ते जानेवाली एक्सप्रेस पर चढ़ाकर पैसा लेने को कहा। वे राजी होकर चले गये। फिर, शैलबाला ने बिस्तरा बिछाकर तीनों बच्चों को सुला दिया। बड़ी बेंच पर पति के लिये बिस्तरा लगाकर, सन्तान और पति के बीच एक छोटी-सी जगह उसने अपने लिये भी फर्श पर बना ली।

भूपति ने कहा-'थोड़ा सो रहा हूँ मैं।'

शैलबाला ने कहा-'पहिले थोड़ा-सा दूध तो पी लो। गरम किये देती हूँ अभी।'

'और तुम ?'

'जागती रहूँगी मैं। दो दिन का हिसाब लिखना बाकी है। उसे पूरा कर लूँ। समय ही कितना है।'

'हे विधाता !'

स्टोव निकालकर जलाने लगी तो शैलबाला की निगाह दरवाजे की ओर गयी। रात अधिक होने पर भी स्टेशन बिलकुल सुनसान नहीं हो गया था। बीच-बीच में लोग आ-जा रहे थे। कभी फेरीबालों की आवाज सुनाई देती थी, कभी शंटिंग करते हुए इंजिनों की फुफकार। जालीदार दरवाजे में होकर उधर देखकर वह बहुत डर गयी।

दबी और डरी हई आवाज में उसने कहा-'सुनते हो जी, थोड़ा उठो तो।'

भूपति ने आराम कुर्सी पर सीधा बैठते हुए कहा| 'क्यों ? क्या है ?

'वही आदमी ! एक बार जाओ तो बाहर-वही आदमी है। वही जो घूम रहा था बहुत देर से।' यह कहकर शैलबाला ने गहनों को कपड़ों के नीचे छिपा लिया और स्टोव छोड़कर एक कोने में खड़ी हो गयी। अखबार में पढ़ी हुई उस ट्रेन की डकैती की याद उसे अभी भी बनी थी। भूपति उठकर दरवाजा खोलकर खड़ा हो गया। शैल की बात सही थी। झुटपुटे में टोपी पहिने एक युवक खड़ा था। वह भूपति की ओर बढ़ा।

भूपति ने पूछा--'आप क्या चाहते हैं ?'

सिर पर टोपी होने पर भी उसकी बाकी पोशाक बंगालियों जैसी थी। युवक ने हँसकर कहा-'चाहिये तो कुछ नहीं। लेकिन देख रहा हूँ आप लोगों को बड़ी देर से।' ... 'आखिर क्यों ? आप कौन हैं ?' क्या पहचान पायेंगे मुझे ? मेरा नाम है निरंजन चटर्जी।

नहीं पहचाने न आप ?'

भूपति ने स्वीकार किया कि युवक उसका अपरिचित है। फिर, उसने पूछा-'क्या आप मुझे जानते हैं ?'

निरंजन बोला-'माफ कीजिये, आपको तो थोड़ा-थोड़ा जानता हूँ पर आपकी पत्नी को ही अधिक जानता हूँ।' - 'मेरी पत्नी को ? याने. जो मेरे साथ हैं यहाँ।' 'जी हाँ।' 'अजीब बात है ! आखिर आप हैं कौन ?'

निरंजन हँसा। बोला-'क्या आपकी स्त्री का नाम शैलबाला देवी है ? एक बार बुलाइये न उन्हें।'

भूपति ने उसे सिर से पैर तक देखा। बोला-'मसला पेचीदा होता जा रहा है। क्या आप उनके रिश्तेदार हैं ?'

'बहुत कुछ।' 'मतलब ?' 'अर्थात्, शास्त्र-सम्मत नहीं, गाँव के सम्बन्ध से-' भूपति ने कहा-'वे तो गाँव की लड़की नहीं हैं।'

निरंजन ने बड़े विनय से कहा-'पहले कलकत्ता शहर के एक अंश का नाम था गोविन्दपुर ग्राम। डर की क्या बात है, बुलाइये न उन्हें एक बार। मैं चोर-डकैत नहीं हूँ-- गांधी जी का चेला हूँ।'

भूपति हँसा। बोला-'इससे मेरा डर तो कम नहीं हुआ।' यह कहकर दो पग कमरे के अंदर जाकर उसने पुकारा-'इधर तो आयो। थोड़ा'। - शैलबाला ने कुछ न समझ पाकर इशारे से कहा-'मुझे क्यों ? मैं नहीं आती।'

'अरे आओ-आओ। यह एक अहिंसक व्यक्ति मालूम पड़ते हैं।

गाँव का रिश्ता क्या है अभी तक नहीं समझ पाया। परन्तु आशा करता हूँ वह खतरे का नहीं होगा।

निरंजन ने कहा-'अब संकोच नहीं। मैं ही भीतर आता हूँ।'

भीतर आकर निरंजन ने टोपी उतार दी। कमरे के उज्ज्वल प्रकाश में उसे देखकर हँसते हुए शैलबाला ने कहा -'अरे ! तुम ?'

निरंजन ने पूछा-'बताओ तो मैं कौन हूँ ?' 'तुम हम लोगों के वही श्रीकान्त हो।'

भूपति ने विस्मय से कहा-'श्रीकान्त !'

'हां, पर असल नाम है निरंजन। बचपन में बड़ा सीधासादा था, इसीलिये हम सब इसे पुकारते थे श्रीकान्त कहकर। तुम इधर कहाँ आये थे ?' - यह कह कर शैलबाला उसके पास आकर खड़ी हो गई। -'अब तो तुम पहचाने भी नहीं जाते। पहिले कितने दुबले-पतले थे और अब इतने लंबे-चौड़े हो गये हो ! रंग भी साफ हो गया है। यह सब हुआ कैसे ?'

निरंजन ने कहा-'श्रीकान्त कहकर पुकारोगी तो कुछ नहीं बताऊँगा।'

इस पर वे तीनों एक साथ बड़े जोर से हँसे।

शैलबाला ही पहिले बोली। उसने कहा-'तुम शायद नहीं पहचान पायोगे। हमारे विवाह की रात को इसे तुमने देखा था। आज ग्यारह साल हो गये हैं इस बात को। हम लोगों की मणि मौसी का लड़का है यह। हमारे किरायेदार थे ये लोग। मणि मौसी कहाँ हैं आजकल ?'

निरंजन ने कहा-'लखनऊ, चचा के यहाँ।'

'तुम्हारी बहिनें कहाँ हैं ? अनिमा की तो शादी हो गई ?'

'हाँ। वे सब ससुराल में हैं।'

'ओह, कितने दिन की बात है ! शादी की तुमने, निरंजन ?

'की है।' 'कहाँ है बहू ? बाल-बच्चे हुए ?' 'हाँ, एक लड़का है। वे पास के कमरे में हैं।'

शैलबाला खुश होकर बोली-'पास के कमरे में ? रुको, मैं देखने जाऊँगी। हम लोग तो, भई, आये थे इधर घूमने, अब लौट रहे हैं। यहाँ गाड़ी बदलनी है। इनका शरीर ठीक रहता तो कुछ दिन और ठहरते।'

भूपति अब आराम-कुर्सी पर निश्चिन्त होकर लेट गया।

निरंजन ने कहा-'अब आपका नाम याद आ गया भूपति मुखोपाध्याय। शुभदृष्टि* के समय मैं वहीं था। बरातियों को मैंने खाना भी परोसा था।'

भूपति ने हँसते हुए कहा-'गाँव के रिश्ते में जो मेरे स्त्री के भाई होते हैं उनको असंख्य धन्यवाद।

शैलबाला बोली-'आखिरी बात बतलाते शायद शर्म लग रही हैं क्या निरंजन ? मेरी विदाई के वक्त कितना रोया था ! कोई भी चुप न करा पाता था। मेरा आँचल ही न छोड़ता था, कहता था-मैं तुम्हारे साथ ससुराल जाऊँगा। मैंने एक अँगूठी दी, रोते-रोते रास्ते में फेंक दी। कहो, याद आता वह पागलपन ?'

निरंजन ने कहा-'ससुराल जाकर तुमने भी चिट्ठी नहीं लिखी, बात खतम हो गई। हम लोग भी मकान छोड़कर चले गये।

हँसते हुए भूपति बोला-'मैं भी खतरे से बच गया।'

शैलबाला हँस पड़ी। बोली-'भई ठहरो, इनको थोड़ा दूध गरम कर दूं। फिर तुम्हारी बहू को देखने चलूंगी।'

-यह कहकर वह स्टोव जलाने बैठी। बोतल का दूध कटोरे में डालकर उसे स्टोव पर रख कर उसने पूछा-'तुम्हारा लड़का कितना बड़ा है ?'

'साल भर का।' 'बहू सुन्दर है, न ?' निरंजन ने कहा-'सब बहुयें सुन्दर ही हुआ करती हैं।' 'अरे बाबा ! यहाँ तक....?'

भूपति बीच ही में बोला---'क्या अपने अनुभव से नहीं समझती ?'

शैलबाला ने कहा- 'रुको तुम। बेहयाई न करो। अच्छा निरंजन तुम्हारी बहू प्यार करती है न तुम्हें ?'

भूपति ने फिर कहा-'सन्तान के जन्म के बाद यह प्रश्न उठता ही नहीं।'

शैलबाला ने हँसते हुए कहा-'तुम्हारी बहू से ही पूँछूगी यह बात।'

भूपति ने पूछा-कहाँ तक जायेंगे, निरंजन बाबू ?'

'बाबू कहने की जरूरत नहीं उसे। नाम लेकर पुकारो। आँखों के सामने आ जाता है वह दृश्य-वह शरारती लड़का, सारे दिन गुड्डी उड़ाने वाला। खिलौनों को तोड़ देता था हमारे घर में घुसकर। कितना मारता था हम सब को ! इसकी बहिनें अपने डिब्बों में पैसा नहीं रख सकती थीं इसके मारे। याद आती हैं ये सब बातें ?'

हँसते हुए निरंजन बोला-'नहीं।' 'अच्छा चलो अपनी पत्नी के पास। याद करा दूंगी सब। क्यों जी, कितना बजा है ?'

निरंजन ने घड़ी देखकर कहा-'करीब एक बजा है। तुम्हारी गाड़ी शायद अढ़ाई बजे है। मेरी लखनऊ जानेवाली गाड़ी है तीन बजे।'

स्टोव से दूध उतारकर शैलबाला ने अपने पति को एक प्याला भर के दिया। फिर उसे बुझाकर खड़ी होकर बोली 'तम्हारी बहू पास के कमरे में है न ? सुनो जी, तुम दूध पीकर सो जाओ। मैं ठीक समय पर आकर जगा लूंगी।'

भूपति ने कहा-'यहाँ कमरे में बड़ा आराम मिल रहा हैं। सारी रात भी अगर न बुलाओ तो भी कोई उजर नहीं।'

निरंजन ने कहा-'आप भो चलिये न, मेरी पत्नी से परिचय करा दूं।'

भूपति ने कहा-'अपनी पत्नी को मेरा नमस्कार देते हुए आप उन्हें मेरे घर पाने का मेरी ओर से निमंत्रण दें। आज रहने दीजिये, बच्चे सो रहे हैं। कलकत्ते जाकर ही परिचय होगा।'

- शैलबाला ने पति को कमर तक एक काश्मीरी शाल से ढंक दिया। फिर धीरे से कहा- 'मैं जल्दी ही लौटूंगी।'यह कहकर वह निरंजन के पीछे-पीछे वेटिंग-रूम से निकल गयी।

कमरे के भीतर के प्रकाश, बातचीत और आराम के कारण बाहर का किसी को ख्याल नहीं था। हेमन्त की रात्रि के अंधकार और कुहरे से प्लेटफार्म दूर तक ढंका हुआ था। निर्जन स्टेशन साँय-साँय कर रहा था। प्रकाश और छाया में यह अनजानी जगह अस्पष्ट रहस्य से भरी मालूम पड़ती थी। लोग आते-जाते जरूर थे, परन्तु झुटपुटे में उनको पहचाना नहीं जा सकता था। कौन कहाँ से आता था-किधर से आता था, सब मिलकर एक अवास्तव स्वप्न-राज्य जैसा लग रहा था। ठंडी हवा का एक झोंका आया। हवा के पुलक स्पर्श से शैलबाला के मन में एक गुदगुदी उठी। वह जैसे अपने बाह्य आवरण को छोड़कर बाहर निकल आई।

कुछ दूर जाकर शैलबाला ने कहा-'कहाँ श्रीकान्त, तुमने तो पास के कमरे में कहा था न ? हम लोग इतनी दूर क्यों चले आये ? कहाँ है तुम्हारी स्त्री ?'

उसके प्रसन्न चेहरे को देखकर निरंजन का मन भी खुशी से भर गया। रुककर बोला-'बुरा न मानना शैल, यही सोचो हम पहिले की तरह हैं। एक बात कहूँ ?'

शैलबाला ने पूछा-'कहो, क्या बात है ?' 'मैंने शादी नहीं की है',-निरंजन ने कहा।

विस्मय से शैलबाला ने उसकी ओर देखा। बोली'यह कैसे ? अपनी स्त्री को दिखाने को कहा था न तुमने ? कहो तो, वे क्या सोचेंगे ? शादी नहीं की तुमने ?'

'नहीं। तुम थोड़ी देर बाद चली जाना, क्यों ?'

शैलबाला ने कहा-'यह तो ठीक है। पर, तुम झूठ क्यों बोले ? इतने दिन बाद मुलाकात-'

निरंजन ने कहा-'शादी नहीं हुई कहने में शर्म लगती है।'

'क्या कर रहे हो आजकल ?'

'अभी कुछ दिन से कलकत्ते के एक कॉलेज में पढ़ा रहा हूँ। इतने दिन बाद तुम्हें देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है।'

'तभी तो पहिले मुझे ही धोखा दिया ?'-हँसते हुए शैलबाला ने पीछे की ओर देखा, फिर बोली-'अगर वे बाहर निकल आयें ? थोड़ा और आगे चलो। कितने शरारती हो तुम !'

निरंजन ने कहा-'शरारती क्यों ? अब मैं तुम्हारे खिलौने नहीं तोड़गा।'

चलते-चलते शैलबाला ने कहा-'डाल दिया न मुझे फजीहत में ? अगर उन्हें पता चल जाय तुम्हारी स्त्री नहीं है, और हम यहाँ घूमने आये हैं, क्या सोचेंगे वे ?'

'यहाँ तुमसे अकस्मात् भेंट होगी किसने सोचा था ?'निरंजन कहने लगा-'ग्यारह वर्ष बीत गये, मानों कल की बात हो। मनुष्य स्वप्न देखता है, पर उसमें रहती है युगान्तकाल की कहानी।'

'बड़े अजीब आदमी हो। कैसे पहचाना मुझे तुमने इस भीड़ में ? मैं सोच रही थी, कौन है यह आदमी जो ताक रहा है बार-बार मेरी ओर ? वह आदमी तुम निकलोगे कौन जानता था।-शैलबाला ने कहा-'सच, स्वप्न ही मालूम पड़ता है। बाबा, कितना रोये थे तुम ! मैं भी कम न रोई थी। बचपन का प्यार रुलाता अधिक है। अब हम अलगअलग होकर बिखर गये हैं --कोई कहीं, कोई कहीं। तुम्हारे चेहरे को देखकर पहिले मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था। बताओ तो क्या देख रहे हो इतना ?'

निरंजन ने कहा-'देख रहा हूँ तुम्हें।' 'क्या देख रहे हो ?' 'तुम्हारी कंजी आँखों को। बिलकुल नहीं बदली हैं।'

शैलबाला ने कहा-'तुम तो उन्हें गदले पानी के पोखरे कहते थे।'

'हाँ, तुम्हारा चेहरा भी वैसा ही है।'

'धुत्, तीन बच्चों की मां हो गयो हूँ, जानते हो ? चलो न थोड़ा उधर चलें।

निरंजन ने कहा-'ठोकर तो न लगेगी ? अँधेरा है।'

शैलबाला बोली-'बड़ा अच्छा लग रहा है इस ठंड में। अच्छा किया तमने शादी न करके, निरंजन। बहुत बड़ा बंधन है शादी। जिन्दगी एक गोरख-धन्धा बन जाती है। अपने पैरों से नहीं चल पाते हम, दूसरों का सहारा लेना पड़ता है पग-पग पर। तुम अच्छे हो।' - प्लेटफार्म के छोर पर आकर ढलुवाँ जगह से वे उतरने लगे। न सामने कोई बाधा थी उनके, न पीछे बन्धन। समयकाल तो एक भ्रान्ति है मन की। उसके आवरण को हटाकर उन्होंने देखा कि उनका अतीत ही वर्तमान बन गया है। अपनी उम्र की बात भी भूल गये बिलकुल। शैलबाला के आचरण में न संकोच है, न भय। क्योंकि उसके साथी के 'पुरुष' से वह परिचित है-कोई आशंका नहीं उससे। इस अंधकार पथ में उतर कर, काल के व्यवधान का अतिक्रमण करके, जैसे वह मानव जाति के आदिम युग में पहुँच गई हो, जब यह सभ्यता, नैतिकता आदि के स्पर्श से रहित थी।

निरंजन ने कहा-'तुम्हारे पतिदेव बहुत पसंद आये। बड़े रसिक जीव हैं। मित्र-जैसा व्यवहार करते हैं।'

शैलबाला बोली-'बड़े दुर्बल स्वभाव के हैं। ठेल-ठेल के चलाना पड़ता है। पर, रहने दो अब यह बात। यह मीठी खुशबू कहाँ से आ रही है ?'

'देखती नहीं सामने की गुलाब की झाड़ी ? सावधान ! सामने रेलवे लाइन है।'

शैलबाला ने उसका एक हाथ अपने बाँये हाथ में पकड़ा। बोली-'बड़ा अच्छा लग रहा है इस निराले में। पच्छिम को इतनी जगहों में घूमी-पर, आज तो मन को रास ढीली हो गई है। तबीयत करती है यहीं बैठ जाऊँ नरम घास पर।

कैसा घना कुहरा है ! कितना रोमांच है हवा में !'

निरंजन ने शांत स्वर में कहा-'यहाँ कोई नहीं-केवल आकाश, तारे और हम हैं, इस आश्चर्यमयी रात में।'

शैलबाला ने कहा-'इससे भी आश्चर्यमय है हमारा तुम्हारा मिलन। हठात् नियति ले आई तुम्हें यहाँ। कल सूरज की रोशनी में यह सब झूठा हो जायगा। चलो, और आगे।

'और दूर जाओगी ? गाँव की तरफ ?' 'हाँ, ले चलो। जहाँ तुम्हारी खुशी।' 'अगर देर हो जाय ? अगर वे ढूंढने लगें ?'

शैलबाला ने कहा-'अच्छा नहीं लग रहा है लौटना। बड़ा नशा है आज की रात में। चलो आगे।'

निरंजन बोला--'स्वप्न-जैसा लग रहा है यह सब। बड़ा अजीब लगेगा कल सबेरे। उन दिनों तुम्हें पहचानने की उमर मेरी नहीं थी, आज भी तुम पहचाने जाने से पहिले ही चली जाओगी। ग्यारह साल तुम्हें नहीं देखा। सारी जिन्दगी नहीं देखता, हर्ज नहीं था। किन्तु, आज तुम्हें पाकर छोड़ने की तबीयत नहीं करती।'

रेलवे लाइन को लांघकर शहर से दूर गाँव के अपरिचित पथ पर वे उतरे। पथ पहचाना नहीं है तो क्या हुआ ? रास्ते के दोनों ओर कँटीली झाड़ियाँ हैं, बीच-बीच में मैदान पड़ते हैं और कभी-कभी पेड़ों की कतार जो काली पोशाक पहिने सन्तरियों की तरह खड़े मालूम पड़ते हैं। दोनों मोहाविष्ट होकर चलने लगे। कुछ दूर जाकर निरंजन ने कहा'शैल ?

शैलबाला ने अपना बायाँ हाथ उसकी कमर में डालकर अस्पष्ट स्वर में कहा-'लौटने को मत कहो....मुझे नींद आ रही है।'

निरंजन ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा–'आज तुम परायी हो, तो भी मुझे संकोच नहीं होगा यदि-'

'-क्या ?'

'जो छुटपन में कहना नही जानता था, अब ज़बान पर आ रही है।'

शैलबाला ने उसांस भरी, फिर बोली-'देर हो गयी बहुत। तो भी अगर कहकर तुम्हें खुशी हो, तो मैं भी कान देकर सुनूँगी, निरंजन !'

निरंजन बोला-'सच, कहूँ। खुशी से रोना आ रहा है मुझे। तुम्हारे केश के गंध में है ग्यारह साल के करुण विरह का संकेत। प्यार की बात करने की अब उम्र नहीं है-खून की गरमी कम हो गई है। और तुम भी वात्सल्य रस से ओतप्रोत हो गई हो। आज हम दोनों देहहीन हैं, बचा है केवल अतीत की कल्पना मात्र।' - शैलबाला ने कहा-'बहुत देर हो गई। कभी नहीं कह सकी,-उसे कहा भी नहीं जा सकता। गत कुमारी जीवन की याद आज पा रही है निरंजन-जब न अपने को जानती थी और न दूसरे को समझने की योग्यता थी। उस अबोध समय के साथी हो तुम। तुमने भी जानने की कोशिश नहीं की, मैं भी नहीं बता सकी। फिर, बीच के समय ने शरीर को खाक कर दिया। आज तुम्हें देखकर फिर मिल गयी है मुझे मेरी निर्मल प्राचीन आत्मा, जो चिरकिशोर है। निरंजन, आज तुम स्वरूपवान हो, किन्तु उस दिन का वह दुर्बल बालक ही मेरे बड़े स्नेह का पात्र था। क्या यकीन करोगे यह बात ?' _ 'जरूर करूँगा। तभी तो आज फिर नये सिरे से नहीं बता सकता तुम मेरी कौन हो। नहीं कह सकता ठीक से यह सम्बन्ध कैसा है ! मैं न भाई हूँ, न दोस्त, न पति-फिर भी अगर देखा जाये तो इन सब को मिलाकर एक गूढ़, दुर्बोध रिश्ता बन गया है मेरा तुम्हारे साथ।' .

मुंह उठाकर काँपते हुए स्वर में शैलबाला बोली-'कहो, और कहो-रुको मत। कहो इस अंधकार में केवल एक आज की रात के लिये। इन ग्यारह सालों में एक दिन भी मैंने तुम्हारी बात नहीं सोची थी-आज तुम्हें पाकर तुम्हारे सिवाय और कुछ नहीं याद आता। तुम्हें देने को कुछ नहीं है मेरे पास, निरंजन ! कुछ ले जाने को भी पात्र नहीं है तो भी मेरे हृदय का दुर्निवार वेग मुक्त होना चाहता है।'

धूल भरे रास्ते से दोनों धीरे-धीरे चल रहे हैं। निस्तब्ध रात्रि में वे अपरिचित गाँव मे होकर वे जा रहे हैं। न पथ भूलने का भय है उन्हें न लौटने की चिन्ता-एक घोर उत्तरदायित्वहीन अभिसार में लिप्त हैं वे दोनों। अभिसारिका के रत्न-आभूषण खुलकर गिरने लगे हैं रास्ते में—पड़ा रहा वहीं उसका पतिव्रत, कर्तव्य, भय और संस्कार।

'निरंजन ?'

शैलबाला के शिथिल देह-भार को सँभालते हुए, वह बोला-'क्यों?

'बता सकते हो क्यों गला रुंध रहा है ? अच्छा निरंजन; कोई डर की बात तो नहीं ?'

'नहीं जानता।' 'लोग बुरा तो न कहेंगे ?'

'समझ में नहीं आता। अच्छा, चलो अब लौट चलें। वह स्टेशन की रोशनी दीख रही है।'

शैलबाला ने जैसे जगकर देखा उस ओर एक निर्बोध दृष्टि से। फिर अस्पष्ट स्वर में बोली अगर तुम्हें कोई

कुछ कहे तो सारा दोष मढ़ देना तुम मेरे सिर पर। कहना मैं ही तुम्हें फुसलाकर ले आयी थी। मेरे समान पापिन इस दुनिया में और कोई नहीं।'

_ निरंजन बोला-'मैं नहीं जानता था शैल, कि हममें उन दिनों के वही दो बालक-बालिका अभी तक जीवित हैं।'

रास्ते के जटिल आवर्तन के कारण वे नहीं जान पाये थे कि घूसते-फिरते वे फिर स्टेशन के करीब आ गये हैं। सहसा प्रकाश और कोलाहल, अपने बिलकुल निकट पाकर वे हकबका गये। तेज रोशनी की आकस्मिकता से घबराकर शैलबाला की इच्छा हुई कि वह फिर अँधेरे में छिप जाये। परन्तु, निरंजन ने घड़ी में देख कर बताया कि अढ़ाई बजने में अब अधिक देर नहीं।

शैलबाला ने अपना जूड़ा ठीक किया और कपड़े सँभालकर पहिने फिर हँसकर बोली-'सोचा था पृथ्वी छोड़ कर कहीं दूर चली गयी हूँ। कौन जानता था कि बैल की तरह घानी के ही चारों ओर घूम रही हूँ।' .

निरंजन ने कहा-'जल्दी आओ तुम्हारी गाड़ी का वक्त हो गया है।'

: किन्तु इस प्रणय-अभिसार का वह परिशिष्ट अभी बाकी था जिसकी कल्पना भी निरंजन ने नहीं की थी। जैसे ही वे जल्दी-जल्दी वेटिंग-रूप के पास पहुँचे वैसे ही पीछे से एक विवाहिता युवती रोआंसी आवाज में बोली-'अरे, अब तक कहाँ थे तुम ? कब से ढूंढ़ रही हूँ तुम्हें ! ये कौन है तुम्हारे साथ?

शैलबाला स्तभित होकर खड़ी रही। निरंजन हतवाक् ! वह स्त्री पास आकर बोली-'इन्हें तो नहीं पहचाना मैंने ?',

'हाँ, इन्हें नहीं पहचानोगी। यह मेरे दोस्त की स्त्री हैं। एक सैकेंड - अभी इन्हें पति के पास पहुँचाकर आता हूँ आइये भाभी जी

जिस बहू को देखने का इतना आग्रह था शैलबाला में कुछ ही समय पहिले, वह अब काफूर हो गया था। उससे सौजन्यता के नाते-दो बातें करने की प्रवृत्ति भी नहीं हुई अब। उसका विवर्ण मुख रक्तिम हो उठा। एक असीम विरक्ति पैदा हुई उसके मन में। इसका दमन करके उसने कहा-'तब क्यों नहीं स्वीकार किया था तुमने कि शादी हो गई है ?'

यह कहकर आँचल से अपना मुँह एक बार फिर अच्छी तरह पोंछकर वह जल्दी से वेटिंग रूम में घुस गयो।

 

* बंगाल में विवाह अनुष्ठान का एक अंग जिसमें विवाह के बाद पहिली बार पति-पत्नी एक दूसरे को देखते हैं।

प्रबोध कुमार सान्याल