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टिनी-मिनी प्ले स्कूल - कहानी
November 18, 2019 • डा. सुनीतासुनीता

कोमा और संजय की कहानी याद आती है, तो आँखों की कोरें भीगने सी लगती थीं। वे कोई पाँच-छह बरस ही तो रहे थे हमारी कॉलोनी में। मगर पास रहते हुए वे कब दिल में बस गए, यह तो पता ही नहीं चला। जब गए तो लगा, एक खाली कोना छूट गया है। एक खला है, जिसे कोई और भर नहीं सकता।

मगर वहाँ अब भी चीं-चीं, चूँ-चूँ चिड़ियाँ दिन भर शोर मचाती हैं। साथ ही बच्चों की हा-हा, ही-ही के साथ हवा में उड़ते स्वर, “मैम, मैम, पिंकी ने हमें मारा!...मैम, देखो ये छोटी वाली बतख कैसे मजे से नाच रही है!... मैम, हम पोएम सुनाएँ!” बीच-बीच में अचानक भोली आवाजों में सहगान शुरू हो जाते हैं, “मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है, बाहर निकालो डर जाएगी...! भेड़ नानी, भेड़ नानी, दे दो थोड़ी ऊन...! जॉनी-जानी...यस पापा! ओपन योर माउथ हा-हा-हा...!”

कभी-कभी तो किताब पढ़ते-पढ़ते मैं चैंक जाती हूँ। ये इतनी सारी आवाजें कहाँ से आ रही हैं...?

संजय और कोमा तो अब यहाँ नहीं रहते। उनका टिनी-मिनी प्ले स्कूल भी इस कॉलोनी के दूसरे छोर पर है। तो फिर ये आवाजें...?

सच ही कोमा और संजय को याद करो तो बहुत कुछ याद आता है। अजब कहानी है उनकी भी। वे हमारे शहर, हमारी कॉलोनी से चले गए, पर उनकी कहानी मन में गड़ी रह गई। बरसों बीत गए पर उनकी याद जरा भी धुँधली नहीं हुई। उनके निश्छल चेहरे, उनकी हँसी, उनकी बातें...! जैसे वे कहीं गए नहीं, हमारे भीतर ही समा गए। बरसों बीते, पर लगता है, अभी कल की ही तो बात है।

आज उँगलियों पर हिसाब लगाने बैठी तो लगा, अरे, संजय और कोमा को इस शहर से गए कोई बारह साल हो गए। जैसे वे कभी भागलपुर के एक छोटे-से गाँव सिबनीटोला से यहाँ आए थे और आकर हमारे साथ-साथ सभी के दिलों में उन्होंने जगह बना ली थी, ऐसे ही लौटकर फिर वे भागलपुर में ही चले गए। वहाँ संजय को एक ठीक-सी सरकारी नौकरी मिल गई। उनकी जिंदगी एक अलग राह पर चल पड़ी।

कभी-कभी संजय का फोन आ जाता है, कभी कोमा का। घर का हाल-चाल, बातें।...पर कोमा यह दोहराए बिना नहीं रहती, “आंटी, यहाँ सब कुछ है। जीवन में सारी खुशियाँ हैं। पर वह सुख जो वहाँ था, वह तो उन नन्हे-मुन्ने बच्चों और टिनी-मिनी प्ले स्कूल के साथ ही छूट गया। वैसी खुशी तो आंटी, दुबारा पाना मुश्किल है। आप और मनु अंकल ने सहारा दिया तो हो गया, आंटी, पर आज सोचती हूँ तो लगता है, वो एक सपना था...!”

सचमुच सपना ही तो था कोमा का टिनी-मिनी प्ले स्कूल...! तभी तो देखते ही देखते उसमें प्राण पड़ गए थे। फिर देखते ही देखते वहाँ नन्हे-नन्हे बच्चों की चहल-पहल और हँसी-खिलखिलाहट सुनाई देने लगी, जो अपनी कोमा मैम से बहुत बहुत प्यार करते थे। उनका नन्ही-नन्ही चिड़ियों का-सा गुंजार अब भी मन में मीठी-सी पुलक भर जाता है। कोमा के बुलाने पर मैं जब भी वहाँ जाती तो यह कहे बगैर न रहती, “कोमा, तूने जरूर इन बच्चों पर जादू कर दिया है!”

सुनकर वह हँसने लगती। बड़ी ही मनमोहिनी हँसी।

मुझे याद है, कोमा ने कितनी घरेलू परेशानियों के बीच शुरू किया था यह प्ले स्कूल। पर फिर उसने इसे सचमुच एक सपना ही बना दिया, जिसमें बच्चे खेल-खेल में पढ़ते थे। खेल-खेल में कविताएँ याद करते थे। एक से एक मजेदार कहानियाँ सुनते-सुनाते थे। खेल-खेल में ही सारी बातें सीखते थे और एक अच्छी दोस्त की तरह अपनी कोमा मैम से प्यार करते थे।

मुझे आज भी याद है, वह दिन जब पहली बार कोमा और संजय को देखा था, तो वे बिल्कुल अपने घर-परिवार के ही लगे थे। संजय की उम्र कोई अट्ठाईस-तीस बरस की रही होगी। कोमा उससे तीन-चार बरस छोटी। एकदम दुबली-पतली सी, पर उत्साह से छलछलाती हुई। हमेशा मुसकराती रहती। दोनों का प्यार उनकी आपसी बातों से छलक रहा था। या फिर उन छोटे-छोटे गदबदे बच्चों की शरारतों से, जिन्हें दोनों मिलकर सँभाल रहे थे।

“आंटी, यहाँ दो कमरों का कोई पोर्शन किराए पर मिल सकता है क्या...?” कोमा ने अपनी मुश्किल बताई।

“हाँ, है तो, पर थोड़ी दूर एक गली में। वहाँ वंदनाजी हैं, मेरी कुछ जान-पहचान है। उनके मकान में छत वाला पोर्शन खाली है।...पर तुम लोग अंदर तो आओ। थोड़ी देर बैठो तसल्ली से।”

फिर मैं उन्हें साथ लेकर गई मकान दिखाने। मकान संजय और कोमा को पसंद आ गया। अगले दिन वहाँ सामान लेकर आने की बात कहकर वे गए तो उनके चेहरे पर अपनेपन की मीठी हँसी नजर आई। यही उससे जोड़ने वाली पहली डोर थी। फिर तो उनसे मिलना-जुलना अकसर होता।

संजय ने इंजीनियरिंग का डिप्लोमा किया हुआ था। पर वह जिस कंपनी में था, उसमें वेतन अधिक नहीं था। शायद आठ-दस हजार रुपए उसे मिलते थे। महँगाई दिन पर दिन सुरसा की तरह मुँह बाए खड़ी रहती थी। पर कोमा कुछ ऐसा जादू जगाती कि उन्हीं थोड़े-से पैसों में उनकी छोटी-सी गृहस्थी खिली रहती थी। कभी उन्हें दुखी नहीं देखा। जब भी वे मिलने आते, तो मन में ढेरों आशीर्वाद निकलते कि ये इसी तरह हँसते रहें। कोई संकट न आए इन पर।

पर परेशनियाँ जो आनी होती हैं, वे तो आती हैं। वे न आएँ तो जिंदगी का मजा ही क्या है।

पहली बार कोमा के चेहरे पर चिंता की लकीर तब दिखाई पड़ी, जब उसके बड़े बेटे मयंक का स्कूल में दाखिला हुआ। उसकी अच्छी-खासी फीस के कारण थोड़ा हाथ खींचकर उन्हें घर की गाड़ी चलानी पड़ी। फिर भी संजय-कोमा दोनों कोशिश करते कि कोई परेशानी की शिकन न झलके। पर दो साल बाद जब छोटे बेटे राहुल का भी स्कूल में दाखिल हो गया, तो फीस देने के बाद घर का खर्च चलाना और मकान का किराया चुकाना यकीनन उनके लिए मुश्किल हो गया।

हमेशा खुश-खुश रहने वाली दुबली, साँवली कोमा के चेहरे पर अब काफी चिंता दिखाई देने लगी। एक दिन मेरे पूछने पर उसने अपनी मुश्किल बताई तो हठात मेरे मुँह से निकला, “अरे कोमा, तुममें प्रतिभा की तो कोई कमी नहीं है। तुम भी तो कुछ कर सकती हो।...और कुछ नहीं तो घर में एक प्ले स्कूल ही खोल लो।”

सुनते ही कोमा खुश हो गई। बोली, “हाँ आंटी, यह तो मैंने सोचा ही नहीं था। यह काम तो मैं कर सकती हूँ।”

मैंने कहा, “अपने बच्चों को तो तुम पढ़ाती ही हो। और बच्चे आएँगे, तो उन्हें भी उसी तरह प्यार से पढ़ाओ। इससे तुम्हारा मन भी लगा रहेगा। बच्चों को तो अच्छा लगेगा ही।”

और बस, अगले दिन से ही कोमा तैयारी में जुट गई। आसपास के कई घरों में उसका अच्छा परिचय हो गया था। उसने घर-घर जाकर बड़े उत्साह से सभी को अपने प्ले स्कूल के बारे में बताया। कुछ दिन बाद उसके घर के बाहर एक सुंदर सा रंग-बिरंगा बोर्ड चमकने लगा, 'टिनी-मिनी प्ले स्कूल'। उस पर हँसते हुए दो खरगोश बने थे।

हफ्ते भर में ही उसके पास आसपास के घरों के पाँच-सात नन्हे बच्चे आ गए। इस बीच उसने कुछ बढ़िया खिलौने जुटा लिए थे। दो-कमरों में से एक को खूब बढ़िया ढंग से सजाकर टिनी-मिनी प्ले स्कूल का रूप दिया गया था। रात-रात भर जागकर कोमा और संजय ने बड़े खूबसूरत पोस्टर तैयार कर लिए थे, जिन पर हँसते-खिलखिलाते बच्चों के चित्र थे। कुछ में वे झूला झूल रहे थे, कुछ में मिलकर नाच रहे थे। कुछ पोस्टरों में छोटे-छोटी कविताएँ भी। दोनों ने मिलकर उन्हें कमरे की दीवारों पर इतने अच्छे ढंग से चिपकाया गया था कि वह कमरा वाकई बच्चों के सपनों का घर बन गया था।

पर कोमा संतुष्ट नहीं थी। दिन में उसका प्ले स्कूल चलता, शाम के समय वह कॉलोनी के घरों में मिलने के लिए जाती। सबसे उसका आग्रह था, “अपने नन्हे-मुन्ने को हमारे प्ले स्कूल में भेजिए। उसे वह भी अपना घर ही लगेगा।”

यों भी टिनी-मिनी प्ले स्कूल के बच्चों के चमकते चेहरे देखकर सबको यकीन था कि हाँ, यह सही है। बात कानों-कान पहुँचती है। धीरे-धीरे पूरी कॉलोनी में लोग कोमा के टिनी-मिनी प्ले स्कूल को जान गए।

फिर एक दिन संजय और कोमा मिलने आए तो हमारे घर के पुस्तकालय पर उनकी निगाह गई। कोमा कुछ किताबें उलट-पुलटकर बोली, “अरे आंटी, आप लोगों के पास तो बहुत किताबें हैं। बच्चों की इतनी अच्छी, रंग-बिरंगी किताबें! आप क्या इनमें से कुछ मुझे दे सकती हैं, स्कूल के नन्हे-मुन्नो के लिए...?”

“क्यों नहीं? तुम्हें जितनी किताबें चाहिए, मिल जाएँगी।...यही नहीं, हमारा आशीर्वाद भी तुम्हारे साथ है।” मैंने हँसकर कहा।

“अरे, अंकल और आपकी भी किताबें हैं इसमें। फिर तो मजा आ गया, आंटी।...अब तो कभी-कभी अंकल को भी आना होगा हमारे टिनी-मिनी स्कूल में अपनी नन्ही कविताएँ सुनाने के लिए।... और हाँ, आंटी, आप कहानियाँ सुनाएँगी हमारे नन्हे-मुन्नों को!” कोमा मुसकराई।

“तुम्हारी बात कोई टाल सकता है क्या...?” मैंने हँसकर कहा, “तुम्हारा कोई दुश्मन होगा तो वह भी नहीं!”

सुनकर कोमा भी हँसने लगी। बोली, “आंटी, मेरा तो दूर-दूर तक कोई दुश्मन है ही नहीं। सब अपने ही हैं और सबसे ज्यादा अपने तो आप हैं। आपके यहाँ आकर लगता है, अपने मम्मी-पापा के घर में ही हूँ...!” कहते-कहते वह भावुक हो गई।

अपने हँसमुख स्वभाव के कारण कोमा ने जल्दी ही आसपास के घरों में अपने परिचय का दायरा बढ़ा लिया। उसके मीठे व्यवहार का जादू लोगों के सिर पर बोलने लगा। अब जो बच्चे उसके पास पढ़ने आते, उन्हीं के माँ-बाप औरों को भी इस अनोखे प्ले स्कूल और कोमा के मधुर स्वभाव के बारे में बताते। टिनी-मिनी प्ले स्कूल बढ़ता चला गया।

एक दिन कोमा ने आकर खुशी-खुशी बताया, “आंटी, आपके आशीर्वाद से मेरे प्ले स्कूल में अब पूरे तीस बच्चे हो गए। मैंने मदद के लिए एक आया भी रख ली है। मैंने सोच लिया है, अब मैं बच्चों को पढ़ाने में अपना पूरा ध्यान लगाऊँगी।”

फिर एक दिन वह आई तो अपने आग्रह की रस्सी से हमें बाँध गई। “आंटी, कल आना है आपको मेरे प्ले स्कूल में। साथ में मनु अंकल को भी जरूर लाइएगा।...मैंने तय कर लिया है, अब से हर शनिवार का दिन किस्से-कहानी के लिए रहेगा!”

अगले दिन पहलेपहल देखा उसका प्ले स्कूल। सच ही सपने जैसा। हम वहाँ गए तो उसके आग्रह पर थे, पर वहाँ इतना आनंद आया कि उठने का मन ही नहीं कर रहा था। बच्चे कविताएँ सुनना चाहते थे, कहानियाँ सुनना चाहते थे। बातें करना चाहते थे। खुद भी खूब-खूब सुनना चाहते थे।...तो भला कोई घड़ी देखकर वहाँ से कैसे उठ सकता था?

बड़े ही आनंदपूर्ण पल वहाँ बिताकर हम उठे तो बच्चों के दमकते चेहरों पर हमने पढ़ा, “थैंक्यू अंकल...थैंक्यू आंटी!...आप फिर आना।”

और सचमुच तीसरे ही दिन कोमा ने फिर आकर खटखटा दिया, “आंटी, बच्चे इंतजार कर रहे हैं आप लोगों का। बार-बार कहते हैं, मनु अंकल और सुनीता आंटी कब आएँगे, मैम?...अब तो अपना हर शनिवार आप टिनी-मिनी प्ले स्कूल के लिए रख लीजिए।”

फिर बोली, “आंटी, इससे हमें फायदा भी हुआ है। मैं सबसे कहती हूँ, हमारे प्ले स्कूल की एक खासियत यह है कि बच्चों के लिए लिखने वाले साहित्यकार हमारे यहाँ आकर अपनी मजेदार कविताएँ और कहानियाँ बच्चों को सुनाते हैं। साथ ही इन बच्चों से बातें भी करते हैं।...इससे बच्चों के मम्मी-पापा बड़े प्रभावित होते हैं।”

फिर उसने हमारे आग्रह पर और लेखकों को भी बुलाना शुरू किया। बच्चे खुश थे लेखकों को अपने बीच पाकर, लेखक खुश थे इतने खुशदिल बच्चों के बीच रचनाएँ पढ़कर।...और कोमा खुश थी कि उसका प्ले स्कूल इस कॉलोनी के और प्ले स्कूलों से अलग है। उसमें बच्चे वाकई खेल-खेल में सीखते हैं। वह कभी-कभी कहती, “मैं तो बच्चों से एक ही बात कहती हूँ, पढ़ना आनंद की चीज है। सीखना आनंद की चीज है। इसमें डरने और परेशान होने की कोई बात नहीं है।”

सचमुच कोमा को अब कुछ कर दिखाने के लिए एक नया क्षेत्र मिला था और वह इसमें कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी। फिर इससे घर की हालत भी सुधरी थी। एक दिन उसने उत्साहित होकर बताया, “आंटी, स्कूल के सारे खर्च निकाल देने के बाद, कोई चार-पाँच हजार रुपए हमारे पास बच जाते हैं। यह सब आपके कारण ही है। आपने न सुझाया होता तो...!”

मैंने हँसकर कहा, “मैं कैसे न सुझाती, कोमा! मैंने देख लिया था, तुम्हारे अंदर मोहिनी है। जिससे भी बात करो, उस पर तुम्हारी छाप जरूर छूट जाती है। इसी कारण तो इतने सारे लोग जान गए तुम्हारे टिनी-मिनी प्ले स्कूल को।...वह भी केवल छह महीने में!”

सुनकर कोमा कुछ लजा गई। मुझे कोमा के प्ले स्कूल के चल निकलने की तो खुशी थी ही। साथ ही इस बात की भी कम खुशी न थी, कि वह घर जो पहले आर्थिक मुश्किलों से जकड़ा हुआ था, उसमें अब नई चहल-पहल और जीवन का संगीत सुनाई देता।

इसमें कोमा के उदारहृदय पति संजय की भी मेहनत थी। वह एक बढ़िया सहायक और दोस्त की तरह कोमा के इस प्ले स्कूल में मदद के लिए हमेशा तैयार रहता। कोमा की लोकप्रियता बढ़ रही थी और हर कोई उसके अनोखे प्ले स्कूल की चर्चा करता। इससे संजय की खुशी का ठिकाना न था। हमारे घर दोनों आते तो संजय चुहल करता, “आंटी, अब मैं कभी रास्ते से गुजरता हूँ तो लोग कहते हैं, यह वही संजय है, जिनकी पत्नी ने टिनी-मिनी प्ले स्कूल खोला है।”

सुनकर हम सब हँसते। कोमा भी हँस पड़ती।

आसपास और भी कई प्ले स्कूल थे, जिनमें कई तो खासी भव्य बिल्डिंगों में, अच्छे-खासे साधनों से शुरू किए गए थे। पूरी तरह वातानुकूलित। महँगे खिलौने, झूले और खूब सारा ताम-झाम। उनकी फीसें ऊँची थीं। पर उनमें वह भावना नहीं थी, जो कोमा के दिल में थी। वह जादू भी नहीं था, जो कोमा के दिल में था और बच्चों को मुसकराने पर विवश कर देता था। इसलिए कोमा के एक छोटे-से कमरे में चलने वाले प्ले स्कूल में हर पल बड़ा सरस गुंजार रहता। पढ़ाते समय कोमा की उत्फल्ल हँसी और खुशी छलक-छलककर बच्चों के दिलों में जा मिलती।

यों कोमा के टिनी-मिनी प्ले स्कूल की प्रसिद्धि का कोई अंत नहीं था। वह खेलने, पढ़ने और सीखने का स्कूल तो था नहीं, पर बच्चे उसे इस तरह याद करते, जैसे वह उनके लिए हँसी-खुशी का मेला हो। कोमा का मीठा व्यवहार और उसका हर समय मुसकराता चेहरा अपरिचितों को भी उसकी ओर खींचता। न सिर्फ बच्चों से, बल्कि उन्हें छोड़ने और ले जाने वाले माँ-बाप और अभिभावकों से भी वह बड़े अपनत्व के साथ बात करती। सबको लगता, बच्चों को सुबह-सुबह यहाँ छोड़ देने के बाद उनकी सारी चिंता खत्म।

फिर बच्चों को सिखाने का कोमा का ढंग भी बड़ा रोचक और लाजवाब था। वह बच्चों के बीच सचमुच बच्ची बन जाती। उनके साथ-साथ गाती। यहाँ तक कि उनके साथ-साथ मजे में नाचती भी।

एक दिन उसने आग्रह किया, “आंटी, कल हमारे स्कूल का सांस्कृतिक कार्यक्रम है। स्कूल के सामने वाले पार्क में कार्यक्रम रखा है। बच्चों के सारे पेरेंट्स आएँगे। आप और मनुजी इसके विशिष्ट मेहमान होंगे...!”

हम लोग थोड़ा जल्दी पहुँच गए तो देखा, कोमा बच्चों को किसी कार्यक्रम की तैयारी करवा रही थी। बच्चों को साथ-साथ खुद भी डांस करके वह उन्हें गीत और कविताएँ याद करवा रही थी। देखकर हम मुग्ध थे। दूर खड़े चुपचाप देखते रहे, जब तक उसका यह रिहर्सल खत्म नहीं हो गया।

फिर पास जाकर मनुजी ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, “कोमा, तुम परीक्षा में पास हो गईं। एक अच्छे टीचर को ऐसा ही होना चाहिए।”

सुनकर कोमा की आँखें भीग गईं। बोली, “अंकल, आपने पापा की याद दिला दी।”

उस दिन का सांस्कृतिक कार्यक्रम तो अनोखा था ही। बच्चों ने ऐसे कार्यक्रम दिखाए कि लगा, हम किसी और लोक में पहुँच गए हैं। बाद में जब मैंने और मनुजी ने वहाँ उपस्थित लोगों को बताया कि टिनी-मिनी प्ले स्कूल के पीछे कोमा की कैसी मेहनत, कैसी तपस्या है, तो सबने उसके सम्मान में खूब तालियाँ बजाईं।

उस दिन डांस के कई प्रोग्राम थे और सारे अनोखे। कोमा का यह नया हुनर हमने पहली बार देखा। बाद में पता चला, उसके सिखाए कुछ बच्चों को स्कूलों की नृत्य-प्रतियोगिताओं में शानदार पुरस्कार भी मिले। यही नहीं, उसके पढ़ाए कई बच्चों का शहर के बड़े अच्छे, नामी स्कूलों में दाखिला हो गया। इससे उन बच्चों के माँ-बाप इतने खुश थे कि वे तंगहाली में चलने वाले कोमा के इस अनोखे प्ले स्कूल की तरह-तरह से मदद करते।

कोमा का प्ले स्कूल में हर वर्ग के बच्चे थे। अमीर भी, गरीब भी। उसके दिल में सभी के लिए प्यार बहता। बच्चे और बच्चे में कोई फर्क वहाँ नहीं था। बल्कि गरीब बच्चों के लिए उसके दिल में कहीं ज्यादा जगह थी। वह उनके दुख-दर्द और मजबूरियाँ समझती थी। एक दिन उसने खुद ही बताया, “आंटी, इधर मेरे प्ले स्कूल में श्रमिक बस्ती के भी कई बच्चे आ गए हैं। इन बच्चों के पास पहनने को ढंग के कपड़े तक नहीं होते। उनसे मैं बस आधी फीस लेती हूँ। कभी-कभी वह भी नहीं। अपनी तरफ से जितना हो सके, मदद करती हूँ, ताकि जीवन की दौड़ में ये भी किसी से पीछे न रहें।”

सुनकर बहुत अच्छा लगा था। आज की दुनिया में ऐसी बातें, ऐसी सोच..?

पर इससे कभी-कभी अजीब तरह के नाटक हो जाते, जिसका मुझे तो कतई इल्म न था। शायद कभी पता भी न चलता, अगर कोमा ने न बताया होता।

सचमुच कोमा के लिए वह एक कठिन परीक्षा ही थी।...हुआ यह कि कोमा सुबह-सुबह स्कूल में बच्चों के साथ गाते-गुनगुनाते हुए एक प्रसन्न दिन की शुरुआत करने वाली थी। तभी दनदनाते हुए मिसेज माथुर आ गईं। बढ़िया सिल्क की साड़ी पहने, खाते-पीते घर की एक स्त्री। रोआबदार चेहरे से टपकता अभिमान। उसने बड़ी हिकारत से कोमा से कहा, “आपने भूड़ कालोनी के ये गंदे बच्चे क्यों रख लिए? इन्हें निकालिए, नहीं तो हम अपने बच्चों को निकाल लेंगे।”

कोमा हक्की-बक्की, “यह क्या कह रही हैं आप...?”

मिसेज माथुर नफरत से नाक चढ़ाकर बोली, “जरा कपड़े देखिए इनके।...ये क्या इस लायक हैं कि इन्हें हमारे बच्चों के साथ...?”

कोमा को गुस्सा तो बहुत आया, पर गुस्से को किसी तरह जज्ब करके उन्हें प्यार से समझाते हुए बोली, “देखिए मिसेज माथुर, बच्चे तो बच्चे हैं। वे गरीब के हों या अमीर के, इससे क्या फर्क पड़ता है? और कपड़ों से क्या होता है?...आपको पता है, ये बच्चे कितने अच्छे और होशियार हैं। कोई महीना भर पहले ये मेरे स्कूल में आए थे और कितना सीख लिया। आपने केवल कपड़े देखे, यह नहीं कि इनके दिल कैसे हैं...!”

“आप किताबी बातें खूब कर लेती हैं, मैडम!” मिसेज माथुर ने व्यंग्य किया।

“पर किताबों की बातें जीवन में उतारने का नाम ही तो शिक्षा है।” कोमा शांति से बोली, “मैं इन बच्चों को पढ़ाती ही नहीं हूँ, यह भी सिखाती हूँ कि वे अच्छे बच्चे कैसे बन सकते हैं।...ये बच्चे किसी के साथ बुरा व्यवहार न करें, बड़ों को आदर-मान दें, ये सारी बातें आप इन बच्चों में पाएँगी!”

“हे भगवान, आप जाने कौन से जमाने की बातें कर रही हैं!” मिसेज माथुर तीखे लहजे में बोलीं, “मैं तो बस एक बात जानती हूँ कि हमारा बच्चा इन गंदे बच्चों के साथ नहीं पढ़ेगा।...बिल्कुल नहीं पड़ेगा। आप फैसला कर लीजिए कि आपको अपना स्कूल कैसे चलाना है! आपको गंदी बस्ती के बच्चों को पढ़ाना है तो बस उनको ही पढ़ाइए।”

एक क्षण के लिए कोमा सोच में पड़ गई। उसके सामने कड़े फैसले की घड़ी थी। पर अगले ही पल उसने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा, “देखिए मिसेज माथुर, हमारा काम सभी को शिक्षा देना है। एक शिक्षक के रूप में मैं भेदभाव नहीं कर सकती। आप चाहें तो अपने बच्चे को खुशी से अभी ले जा सकती हैं। पर मैं श्रमिक बस्ती के इन बच्चों को नहीं निकालूँगी।”

इस पर बेशकीमती रेशमी साड़ी पहने मिसेज माथुर तमतमाते हुए अपने बच्चे आदित्य की बाँह पकड़कर तुरंत ले गईं।

कोमा को इस बात का थोड़ा दुख था कि उसके इस निर्णय के कारण उसके प्ले स्कूल का एक बच्चा कम हो गया। आदित्य सचमुच अच्छा बच्चा था और उसे वह बहुत प्यार भी करती थी। पर अपने भीतर उसने एक आत्मगौरव भी महसूस किया कि उसने जिंदगी में यह एक नेक काम किया है और सच्चाई का साथ दिया है।

पर दो दिन बाद ही कोमा के सामने जो दृश्य था, उसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी। उसने देखा कि आदित्य अपनी मम्मी की उँगली थामे, धीरे-धीरे प्ले स्कूल की ओर बढ़ा चला आ रहा है।

नखरीले स्वभाव वाली मिसेज माथुर बड़े संकोच के साथ कमरे में आईं और कोमा से बोलीं, “मैडम, इसने तो घर में रो-रोकर बुरा हाल कर रखा है। कहता है, मुझे तो कोमा मैडम के ही स्कूल में जाना है। लो, सँभालो इसे।”

कहते हुए उनकी आँखें नीची थीं। कोमा अचरज से देख रही थी, यह सच है या सपना...?

“मैं नहीं जानती थी कि आप हमारे बच्चों को हमसे भी ज्यादा प्यार करती हैं। तभी तो यह कहीं और जाने को तैयार ही नहीं हुआ।” मिसेज माथुर लज्जित होकर कह रही थीं।

इस पर कोमा के चेहरे पर आत्मविश्वास से भरी मुसकान खिल गई। उसने बड़े प्यार से आदित्य के सिर पर हाथ फेरा और उसे पास बिठा लिया। मिसेज माथुर की ओर देखकर बड़े मीठे स्वर में बोली, “आज आदित्य ने एक शिक्षक के रूप में मेरा माथा गर्व से ऊँचा कर दिया, मिसेज माथुर! आदित्य जब बड़ा होगा तो आप महसूस करेंगी कि उसमें औरों से कुछ अलग, इंसानियत की एक खुशबू सी है। तब आपको इस पर गर्व होगा और इस स्कूल की भी याद आएगी, जिसमें हमने उसके व्यक्तित्व और सही शिक्षा की नींव रखी!”

एक छोटी-सी घटना थी, पर एक शिक्षक के रूप में सचमुच यह उसकी बहुत बड़ी जीत भी थी।

अपने स्कूल के इन बच्चों के साथ हर रोज बीतने वाले कोई चार घंटे कोमा के लिए कैसे अजब सुख भरे होते थे, इसे वह अकसर बताया करती थी। इससे उसकी गृहस्थी की गाड़ी तो मजे में चलने ही लगी थी, साथ ही एक अनोखी मानसिक तृप्ति भी उसके चेहरे पर झिलमिलाती रहती थी।

कोमा के प्ले स्कूल ने चार-पाँच बरसों में ही खूब तरक्की कर ली। उसके सामने खूब पैसे वाले लोगों द्वारा बड़े-बड़े

साधनों से खोले गए प्ले स्कूल भी फीके पड़ गए। लेकिन कोमा में कभी इस बात का घमंड नहीं आया। जब-जब मुझसे मिलती, वह हमेशा मुसकराकर कहती, “आंटी, कल के एक नए समाज को बनाने में अपनी एक छोटी-सी भूमिका मैं भी निभा रही हूँ।”

यह सिलसिला आगे भी चलता रहता, अगर एकाएक उसके जीवन में फिर एक आकस्मिक मोड़ न आ जाता।

यह भी शायद एक नाटक ही था।...एक आश्चर्यजनक नाटक! इसका पता भी मुझे कोमा से ही लगा।

कोई दस साल पहले संजय ने भागलपुर में एक अच्छी-सी सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा दी थी। उसका कोई जवाब नहीं आया तो उसे वह भूल ही गया। सोचा, एक एप्लीकेशन ही तो थी, पता नहीं कहाँ इधर-उधर हो गई होगी। तब से समय की नदी में बहुत पानी बहा। संजय और कोमा कोई ढंग की नौकरी न मिलने पर काम-धाम की तलाश में हमारे शहर आए तो फिर यहीं के हो गए। और फिर कोमा के टिनी-मिनी प्ले स्कूल ने तो उन्हें हमारी पूरी कॉलोनी का अपना, बहुत अपना बना दिया।

पर फिर अचानक एक पत्र...! पता नहीं कहाँ-कहाँ से घूमता-भटकता वह संजय के पास आया कि उसे भागलपुर में जाकर तुरंत वह सरकारी नौकरी ज्वॉइन करनी है। वहाँ पक्की नौकरी की सुरक्षा थी और वेतन भी अच्छा था। तो तय हो गया कि उन लोगों को जाना ही है। पर कोमा को अपने प्ले स्कूल को समेटने की कल्पना से ही दुख हो रहा था। और संजय को भी। इसलिए कि स्कूल चाहे कोमा चलाती थी, पर उसके प्रबंध का सारा जिम्मा संजय का था। आफिस के अलावा जितना भी समय मिलता, वह स्कूल के लिए खुशी-खुशी सारी भागदौड़ करता था।

पर अब संजय और कोमा दोनों के आगे विदा की घड़ी थी। उनके चेहरे पर खुशी के साथ-साथ एक हलकी उदासी भी थी। उनका सुंदर सपनों जैसा टिनी-मिनी प्ले स्कूल पीछे छूट रहा था और वे खिलखिलाते बच्चे भी।... वह स्कूल नहीं, मीठी खुशबू वाला एक पौधा ही तो था, जिसे इतने प्यार और परिश्रम से उन्होंने सींचा था।

आखिर चलते हुए कोमा ने अपनी सहायक अध्यापिका सोनाली को ही वह स्कूल सौंप दिया, ताकि उसके जाने के बाद भी 'टिनी-मिनी प्ले स्कूल' चलता रहे। और सच ही वह चल रहा है, आज तलक।

जब कभी अपनी कॉलोनी के पश्चिमी छोर की ओर मेरे कदम बढ़ते हैं, तो एक बड़े से हरे-भरे पार्क के समीप वह सुंदर सा रंग-बिरंगा बोर्ड आँखों में कौंध उठता है, 'टिनी-मिनी प्ले स्कूल।' उस पर खिलखिलाकर हँसते वही दो खरगोश। और तभी संजय और कोमा के हँसते-मुसकराते चेहरे एकाएक आँखों के आगे आ जाते हैं।

मैं कल्पना करने लगती हूँ कि घर का सारा सामान ट्रक में रखवा लेने के बाद, पीछे मुड़कर कोमा और संजय ने आखिरी बार अपने किराए के घर के आगे लगे बोर्ड 'टिनी-मिनी प्ले स्कूल' पर एक नजर डाली होगी, तो कैसी गहरी टीस और तृप्ति एक साथ उनके चेहरे पर उभर आई होगी।

मैं आज भी जब कभी उस गली से गुजरती हूँ और उस बोर्ड पर मेरी निगाह जाती है, तो उस अनोखी, सुंदर शिक्षिका के लिए मेरा मन प्यार और आशीर्वाद से भर उठता है।