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उम्मीद की लहरों पर गतिशील नौका में खिलते-खिलाते फुलों की सी कविताएं
October 25, 2020 • दिविक रमेश • साहित्य नंदनी


दिविक रमेश, divik_ramesh@yahoo.com, mob. 9910177099

फूल की जिद, मंजु गुप्ता, 2015, 300 रुपए, मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली-1100321

आज की इस, मनुष्यों के रिश्तों और संवेदनाओं पर प्रहार कर रही बाजारवादी ग्लोबल दुनिया में, जहां मनुष्य प्रायः एक डारावने, दर्दनाक, और अकेले कर देने वाले समय में रहने को विवश है, वहां सुखद लग सकता है एक ऐसा रचनात्मक हस्तक्षेप जो 'फूल की जिद' की तरह हर हाल में खिलने के संकल्प, स्वभाव और अस्तित्व के बोध से सम्पन्न होता है। असल में, महिला कवि मंजु गुप्ता के नए कविता संग्रह "फूल की जिद" को पढ़ते हुए मुझे ऐसा ही लगा है। कवि ने अपने गद्य भाग में कविता पर केन्द्रित कुछ ऐसी बातें कही हैं जो उनकी कविताओं की गहराई को समझने में मददगार हो सकती हैं। उनके अनुसार, "फूल खिलता भी है और झड़ता भी, फिर हम झड़ना छोड़ भला खिलना क्यों न देखें और खिलना देख कर खुद भी क्यों न खिलें? ...यह समस्याओं से पलायन नहीं, चुनौतियों को नकारना नहीं वरन जीने के लिए ऊर्जा बनाए रखने का आज़माया हुआ सदियों पुराना नुस्खा है।" मंजु गुप्ता किसी भी सजग कवि की तरह यह भी जानती हैं कि" अच्छी और सच्ची कविता का आधार तो कवि की जीवन-दृष्टि ही होती है.." और प्रश्न-शैली में यह भी कि "अपने परिवेश से सरोकार रखे बगैर कोई संवेदनशील व्यक्ति लेखन कैसे कर सकता है?" हम जानते हैं कि किसी भी रचना पर जब रचनाकार की जीवन-दृष्टि या उसकी सोच लद कर आती है तो वह रचना को दो कौड़ी का बनाने में थोड़ी भी देर नहीं लगाती। मंजु गुप्ता की कविताएं इस खतरे से बची हैं, इसलिए प्रभाव छोड़ने में सक्षम हैं। उनका मानना भी है-"ये कविताएं मेरे मन की ईमानदार और सहज अभिव्यक्ति हैं। ...जैसे फूल खिले बिना, बादल बरसे बिना, हवा चले बिना और पानी बहे बिना नहीं रह सकता; खिलना, बरसना,चलना और बहना उनका स्वभाव है, अस्तित्व है यानी जीवित होने की शर्त है, वैसे ही कविता लिखना मेरा स्वभाव है, जरूरत है।"

मंजु गुप्ता का यह पांचवा कविता-संग्रह है जो 2004 में प्रकाशित उनके चौथे संग्रह "धूप की चिरैया" के लगभग 10 वर्ष के अंतराल पर प्रकाशित हुआ है। पहला संग्रह "मिट्टि की वर्णमाला" 1994 में प्रकाशित हुआ था। मैंने पहले संग्रह के संबंध में लिखा था कि "ये कविताएं हमारी समृद्ध काव्य-परंपरा में आती हैं। इनके माध्यम से जिजीविषा और सृजनशीलता की खोज और प्रतिष्ठा हुई है।" यही नहीं, कविताएं पढ़ते हुए मैंने यह भी पाया था कि मंजु गुप्ता कविताओं की प्राणप्रतिष्ठा के लिए प्राय:प्रकृति से ऊर्जा (प्रेरणा) ग्रहण करती हैं और बुनियादी तौर पर उनकी कविताएं स्पष्ट सामाजिक रिश्तों और सरोकारों की हैं। उनका एक केन्द्रीय विषय 'लड़की' भी रहा है। पहले ही संग्रह की लड़की केन्द्रित कविताओं की ओर मेरा ध्यान इन शब्दों में गया था-"अनेक कविताएं लड़की से संबद्ध हैं जिनके माध्यम से लड़की की, उसके सपनों पर होने वाले प्रहारों, उसकी भयावहता लेकिन साथ ही उसकी क्षमताओं को भी अभिव्यक्ति मिली है।" सौभाग्य से मैंने मंजु गुप्ता की लगभग सभी कविताएं पढ़ी हैं। अपने अंतिम संग्रह "फूल की जिद" तक की यात्रा में मंजु गुप्ता की कविताएं उनकी ऊपर दी गई जीवन-दृष्टि और सोच की बुनियाद पर ही खड़ी देखी जा सकती हैं। उनके अनुभवों का विस्तार हुआ है, उनका अभिव्यक्ति कौशल बढ़ा है लेकिन अपने विविध रूपो और लक्ष्यों में प्रकृति, लड़की (आज के शब्दों में नारी विमर्श), मानवीय रिश्ते और सरोकार आदि उनकी कविताओं के केन्द्र में आज भी वास करते हैं।कुल मिलाकर इनकी कविताएं निराशा में भी उम्मीद की कविताएं हैं। अगर पहली ही कविता "फूल की जिद" पर विचार करें तो इसके शिल्प में प्रतीक, श्लेष, अन्योक्ति आदि के माध्यम से कितनी ही अर्थ-छवियों का सशक्त अनुभव किया जा सकता है। मसलन, मुझे तो कहीं-कहीं, कचरे के ढेर पर खिले और खिलखिलाते फूल में गरीब और दलित बच्चे के भी दर्शन हुए हैं। फिर भी इस कविता का पाठ बुनियादी तौर पर हमें, इस दौर के किन्हीं भी अंधेरों, किन्हीं भी भयावहताओं आदि को चीर कर अपने अस्तित्व को जिन्दादिली से सिद्ध करने की संवेदनशील समझ से सम्पन्न करता है। अपने होने के इर्द-गिर्द खड़े कर दिए गए उपेक्षाओं के किलों को ढहाने का रुतबा या औकात देता है। पंक्तियां हैं-"यह फूल की जिद नहीं/तो और क्या है/कि खिलने का संकल्प करने के बाद/वह न दिन देखता है, न रात/न मौसम देखता है, न बरसात/न जगह देखता है, न देश-काल/बस खिल जाता है।" वस्तुत: इस कवि के लिए स्वयं कविता ही उम्मीद का चिराग है। "कविता-उम्मीद का चिराग" की निम्न पंक्तियां इस दृष्टि से भी पढ़ी जा सकती हैं- "बारूदी दुनिया में सुलगता आँसू है कविता/आदमी का संघर्ष/और आक्रोश है कविता/....जब बंद हो जाते हैं/ज़न्दगी के सब द्वार/...तब खोल जाती है कविता/कालकोठरी में वातायन/ बाल जाती है/चुपचाप/निराशा की दहलीज पर/उम्मीद का चिराग।" यहां 'बाल' जैसे शब्द के प्रयोग पर विशेष ध्यान जाना चाहिए। कहना चाहूंगा कि इस कवि के पास अपनी एक भाषा-शक्ति भी है और कहन की अपनी विशिष्ट शैली भी। फागुनी धूप की बात चलती है तो भाषा का यह तेवर सहज ही मन को जीत लेता है--"यह गुनगुनी, उजली धूप/धूप नहीं, नदी है/गुनगुने पानी की/सूरज के शॉवर से झर रही/फुहार है।" और रसिकता या कहूं बेल और पेड़ का पवित्र 'फ्लर्ट" यूं भी व्यक्त किया जा सकता है, इस कवि से सीखा जा सकता है- "बीज अंकुर बना/दो पत्तियों का ध्वज लिए/उठकर खड़ा हुआ/फिर बढ़ा और बगल वाले पेड़ का सहारा ले/चढ़ने लगा कदमकदम, होले-होले/.लाल और हरे की जुगलबंदी-सी तोतापरी बेल/पेड़ से लिपट हँस रही थी/हँसे जा रही थी/काँधे चढी, फूलों लदी गदराई बेल को/पुष्ट बाहों में उठाए/गबरू जवां पेड़/हीरोइन को हाथों में उठाए/फिल्मी हीरो सा/मस्ती में झूमता/गीत गा रहा था।"..इसी प्रसंग में एक दिलचस्प उदाहरण "अचानक वसंत इस बार' कविता से भी लिया जा सकता है-- "और तो और किताब गा रही थी/ पन्ने फड़फड़ाती/पेन झूम रहा था मंद-मंद मुस्कुराता/परदे हिल-हिल कर ताल दे रहे थे।" विस्तार में जाएं तो जगह-जगह ऐसा भाषा-तेवर देखा जा सकता है। कविताओं की सहज सुबोधता तो पाठक को अपनापन देने में सर्वथा सफल है। एक बात या विशिष्टता और जिसे उनकी कविता "कविता जी रही हूं में देखा जा सकता है। मंजु मनुष्य रूपी रचना को किसी भी रचना से ऊपर मानती हैं, जो उचित ही है। यह तथ्य उनकी इन पंक्तियों से बखूबी समझा जा सकता है-" कविता लिखना छोड़/आजकल मैं कविता जी रही हूं/अपने नाती अभ्यु के साथ/हँसती हूं, गाती हूं/खेलती-कूदती/खुशियां छलकाती हूं/मैं खुद छंद-बद्ध कविता हो गई हूं। " बताता चलूं कि इसी संग्रह में अनेक कविताएं छंदोबद्ध भी हैं।

जिन पाठकों ने मंजु गुप्ता के अन्य संग्रहों को ध्यान से पढ़ा होगा उनका ध्यान इस संग्रह की एक विशेषता पर भी जाएगा। इस संग्रह में मंजु जी ने अपने पूर्व के संकलनों में प्रकाशित अपनी कितनी ही कविताओं को यहां भी संकलित किया है। इससे उनके कम से कम दो आशयों की पूर्ति होती तो नजर आती ही है। एक तो यह कि जो पाठक उनके पूर्व के संकलनों को पढ़ने से चूक गए होंगे, उन्हें उस चूक से उपजी कमी से कुछ राहत मिलेगी। दूसरा यह कि सजग पाठक कवि की अपनी पसन्द की अनेक विशेष कविताओं की पहचान कर पाएगा।

इस संग्रह मे मंजु की एक बहुत ही बेहतरीन कविता "नन्हें चाँद को गोद में उठाए" भी संकलित है। यह कविता तब भी बेहतर हुई होती जब इसमें एक बेटी के अपने नन्हें के जन्म पर होने वाले अद्भुत अहसास मात्र का, जिसमें नवजात शिशु के प्रति सहज चिन्ता और फूलों से लदी लता का सा ही नहीं बल्कि पूरी वसुंधरा हो जाने का आनन्द सम्मिलित है, चित्रण हुआ होता। लेकिन कविता की इन पंक्तियों ने बल्कि कहूं कविता के हिन्दी कविता परम्परा के लिए एक अछूते से अहसास ने, पूरी कविता को चार चाँद लगा दिए हैं-- "हे भगवान! कैसा जादू है। कि मेरी ही बेटी को/मुझ पर नहीं रहा विश्वास/आजकल पूछती है बार-बार/हाथ धोए?/बोतल उबाली?" सच पूछा जाए तो चुटकी लेने की अदा मंजु जी की एक प्यारी विशेषता है जो उनकी कविताओं में बराबर झलकती है, और वह भी कभी-कभार तो अच्छा खासा व्यंग्य बन कर। उनकी कविता"मुझे मरने मत दीजिए" इस दृष्टि से एक सशक्त उदाहरण है जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-"मैं हिन्दुस्तान की जनता हूं.../नेताओं के लिए में मात्र एक वोट हू/भाषण में श्रोता हूं/...दंगों में दोनों तरफ में ही मरता हूं/ अस्पतालों के बाहर बेतरह खांसता हूं/सरकारी स्कूलों में मेरे ही बच्चे /देशभक्ति के गीत गाते हैं/चौराहों पर भीख माँगते हैं/कूड़े से रद्दी बीनते हैं। ...मेरी छाती पर/आपकी कोठियां खड़ी हैं/...मेरा मरना जनाब, आपके लिए अच्छा नहीं/...मुझे कुचलिए, छलिए, जो चाहे कीजिए/जिंदा गाड़ दीजिए/कीमा बनाकर कबाब-सा खाइए/पर, मुझे मरने मत दीजिए/आपके लिए मेरा/मर-मर कर जीना ज़रूरी है। " और जब कवि के केन्द्र में रखी आती है तो वह बिना अतिरिक्त रूप से प्रतिशोधी हुए प्राय: ऎसी ही शैली में प्रतिरोध प्रस्तुत करती है जो ईश्वर की मार की तरह मारक भरपूर होता है लेकिन दिखाई नहीं देता-"पति का लाड़-प्यार पाने के लिए ज़रूरी है, थोड़ा मूर्ख, थोड़ा नादान होना/हर बात में सहारा ढूँढना, सलाह लेना/पत्नी का अटूट आत्मविश्वास/पति के अहंकार पर/बजता है थोड़े सा टन्न/और उसकी नादानी जगाती है/उसका सोया आत्मविश्वास/उद्बुद्ध करती है पुरुषत्व। " कवि की यही अदा उन कविताओं में बखूबी से मौजूद है जो प्रभु अथवा ईश्वर को संबोधित हैं। देखिए"प्रभु, में नहीं आऊंगी मंदिर/क्यों आऊं?/वहां तुम मुझे मिलते जो नहीं/मंदिर में, टिककर बैठ सको क्षण भर/इतनी फुर्सत है तुम्हें?/तुम्हारे शिव के गणों -से/कोटि-कोटि बेढंगे भक्त/क्या पल भर के लिए भी/तुम्हें करने देते हैं विश्राम?" और जरा "ईश्वर और आदमी" की इन पंक्तियों मे आदमी को बनाकर सुख शय्या पर सो जाने वाले ईश्वर के प्रति आज की नई पीढ़ी के बालके। के से आदमी की बेबाकी और बेतकल्लुफी के दर्शन भी हो जाएं-- "या अल्लाह, यह ज्यादती में नहीं करूंगा बरदाश्त/करूंगा प्रोटेस्ट तुम्हारी दादागिरी के खिलाफ/...हमें बनाकर अपनी सृजन इच्छा तो कर ली पूरी/पर अब कौन करेगा संपूर्ण, जरूरतें हमारी?...बेचारा ईश्वर भूल गया था हँसना/छूट गया था उसका खाना/...ईश्वर का ये बुरा हाल देख/एक दयालु-से दिखने वाले सज्जन को कुछ दया आई/उसने दूर से ही हाथ उठा, गुहार लगाई/अरे ओ ईश्वर, ये तुमने अपना क्या हाल बना रखा है। कुछ करते क्यों नहीं भाई। खैर तुमसे कुछ चार्ज नहीं। करूंगा/ऊपर से एक मुफ्त में सलाह भी दूंगा/...सो वह पैगंरनुमा आदमी/ईश्वर के कान में फुसफुसाया--/ तुम चुपचाप जाकर, आदमी के दिल में छिप जाओ/वहाँ तुम सुकून से सांस ले सकोगे/...ये कमबख्त आदमी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा/और अपने दिल में भूले से भी/झाँककर नहीं देखेगा।" और अगर कवि की प्रकृति धर्मा अर्थात फूल, पत्तों, ऋतुओं आदि से जुड़ी कविताओं को लें तो वहां भी ऐसी छटाएं भरपूर मिलेंगी। उदाहरण देने से पहले इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि प्रकृति के सौन्दर्य के प्रति कवि की ललक और सूक्ष्म निरीक्षण-शक्ति जहां इनकी कविताओं का एक विशिष्ट गुण बन कर उभरा है वहीं उनके साथ मनुष्य और उसके जीवन की गंध अर्थात सरोकार को जोड़ कर उन्हें एक ऊंचा पायदान भी थमा दिया है। अब उदाहरणों पर आता हूं--"जंगल, पेड़ों का कुनबा/घर के बुजुर्ग -सा। (पेड़ों का कुनबा) " अथवा "तपती धूप में हरी, नन्हीं पत्तियाँ" नामक कविता की ये पंक्तियां--"धूप के चाबुक सहती/नहीं चूकती मुस्काना/झोंका आते ही प्यार भरा/हँसी से दोहरी हो/लगती हैं नाचने खिल-खिल/हरी नन्हीं पत्तियां/ न कोसती हैं मौसम को/न गलियाती हैं सूरज को/ढीठ ज़िन्दगी का उत्सव मना/पीड़ा को गाती हैं।" अथवा "मैं बूंद बनकर बरसना चाहती हूं" कविता की ये पंक्तियां भी"सागर से मिल/मैं अस्तित्वहीन होना नहीं/बूंदपन खोना नहीं/सागर होना चाहती हूं/अनंत विस्तार का एक धड़कता कण बन/सीमामुक्त होना चाहती हूं/मैं बूंद बनकर बरसना चाहती हूं।"इस संग्रह में फूल केन्द्रित कविताओं पर अलग से विचार किया जा सकता है क्योंकि उन्हें इस संग्रह में विशेष रूप से पहला स्थान दिया गया है। फिलहाल इस संदर्भ में इतना ही कहना चाहूंगा कि फूल को फूल के अस्तित्व में रखते हुए (अर्थात उसका मनवीकरण किए बिना) - उसके संसर्ग से आज के मनुष्य और उसकी जीवन-स्थितियों के विभिन्न (सरल-जटिल, खट्टेमधुर) आयामों को सहज अभिव्यक्त कर देने की कला में कवि सिद्धहस्त है। जैसे-"फूल बेचने को भी/ धंधा बन दिया/ अब हालत यह हो गई है/कि फूल मंहगे/और आदमी सस्ता हो गया है।" अथवा ये पंक्तियां -"सूखे फूल/कुचले जाकर/गली,मुहल्लों में/कूड़े के ढेर में पड़े/बदबू फैलाते हैं। भगवान के प्रियजनों का/ आज की दुनिया में/यही हश्र हैं।" और यह दिलचस्प जिज्ञासानुमा प्रश्न भी कितना मौजू है--"कली ही खिलकर फूल बनती है/जैसे कोई बालिका बनती है/नवयॊवना युवती।/ लेकिन कली स्त्रिलिंग है/फूल पुल्लिंग/हमारी भाषा में फूल/पुल्लिंग क्यों है?" यहां मुझे ब्रिटैन में रह रही कवि उषा वर्मा की एक कविता "कली और फूल" की याद हो आई है जिसके अनुसार, "कली जब तक कली रहती है/वह नारी बनी रहती है।/लेकिन फूल खिलते ही/पुरुष बन जाता है।/ होते यदि/कामता प्रसाद गुरु,/जदा, तो पूछती,/कली और फूल का/यह व्याकरण कैसा?"

इस संकलन को सहज ही मंजु गुप्ता की कविताओं का प्रतिनिधि संकलन कहा जा सकता है क्यों कि इसमें न केवल उनकी बेहतरीन कविताएं संकलित हैं बल्कि हिन्दी कविता की मुख्य धारा की दृष्टि से भी यहां कई उल्लेखनीय कविताएं पढ़ी जा सकती हैं। अंत में इतना तो कहना चाहूंगा ही कि इस संग्रह की कितनी ही कविताओं का स्वभाव ऐसा है जो स्वयं में तो रचनात्मक है ही, अपने संसर्ग में, खुले मन से, आने वाले पाठक को भी सृजनशील बनाने में सक्षम है और सृजनशीलता ही मनुष्य का वह गुण है जो उसमें तो,हर हाल, चुनौती और उम्मीद का फूल खिलाए रखता ही है, अपने इतर सबमें में भी उसे खिलाता है। "फूल का स्वभाव" कविता की इन पंक्तियों से भी इस बात को समझा जा सकता है--"और सिर्फ खिलता ही नहीं/सबको खिलाता है/हँस कर, मुस्कुरा कर/सबको हँसाता है/फिर देखते-ही-देखते/सबमें खिल जाता है/आँखों में,बाँहों में/मन में, रोम-रोम में।" तो ऎसी ही अनेक कविताओं से सम्पन्न हैं मंजु गुप्ता का यह संग्रह, जिसका स्वागत भला कौन नहीं करना चाहेगा बावजूद थोड़ी-बहुत उपेक्षणीय कविताओं के जो किस संकलन में नहीं होती।

मंजु गुप्ता, नई दिल्ली, मो. 9711080219