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वक्त इम्तहान का है अंत का नहीं
October 3, 2020 • डॉ श्यामबाबू शर्मा • साहित्य नंदनी


डॉ श्यामबाबू शर्मा, शिलांग, मो. 9863531572

अवधी की  एक लोक कथा को खड़ी बोली में रूपायित कर बात शुरू करें तो- बहुत पहले दो मित्र रहते थे। रोजी-रोटी की तलाश में वे परदेश गए। मेहनत-मजूरी कर शाम को दोनों किसी होटल में भोजन के लिए गए। और उन्होंने होटल मालिक से दाल फ्राई और रोटी परोसने को कहा। भुगतान कर दोनों वापस हो लिए। बाद में वे अपनी रसोई स्वयं बनाने लगे। समय गुजरता गया। दोनों दोस्त भी काम की फिराक में अलग-अलग जगहों पर रहने लगे। एक दिन अचानक उनमें से एक उसी पहले दिन वाले होटल में खाने के लिए गया। खानसामा उसे आश्चर्य से देखता है कि-अरे यह तो वही व्यक्ति है जो उसके इस भाव से आगुंतक उसके विस्मय का कारण पूछता है। खानसामा ने उसे बताया कि जिस रोज वह और उसका दोस्त दाल फ्राई-रोटी खाकर गए थे उस दिन दाल का बर्तन धोते समय उसमें एक साँप मिला था परंतु यह अच्छा है कि तुम पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। बस इतना सुनते ही वह पसीने-पसीने हो गया। बिना कुछ खाये वह वापस चल पड़ा परंतु कुछ दूर जाकर वह गश खाकर गिर जाता है। और बस चन्द घंटों में ही उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। उसके चिंतन और सोच के विष ने उसके प्राण ले लिये।

बहुत कुछ वैसी ही दशा आज के सबसे बुद्धिमान जानवर आदमी की हो चली है। जो अति दहशत और चिंता में जी रहा है। तब ऐसे में इस महामारी के खिलाफ महायुद्ध में कोई भी तमाशाई बनकर तो नहीं रह सकता। निश्चित ही आज की पीढ़ी तकनीक की गोद में सेयी-पाली गयी है। तकनीक की ऐसी छाया पहले नहीं देखी गयी। और यह सत्य है कि जीवन अब इंसानी सत्संग से अधिक मशीनी सोहबत में है। विकास की  खुल्लम खुल्ला रेसों ने जो नई दुनिया गढ़ी उसमें विकास का रथ ‘परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ’ की तेजस स्पीड से चौकड़ी भर रहा है। कुछ समय की उपलब्धियों के आँकड़ों में  वैचारिक गिरावट भी शुमार कर ली  जाय तो इसका रकबा निश्चित ही बढ़ा है। साधन स्मार्ट और उपयोग करता घोंघाबसंत फॉरवर्ड की लोक दुनिया में स्वयं बैकवर्ड। आत्ममुग्ध सजीव संज्ञायेँ कभी डार्कनेस पर गदगद और कभी लाइक- नालाइक की गड़ना में। दौड़ाइए नजर प्राइवेसी के पैरोकार सब कुछ साझा करने को लालायित। इस विचित्र मायावी दुनिया की अपनी संस्कृति है, तौर-तरीके हैं और एटीकेट्स हैं। जीवन के प्रति निष्ठा ही नदारद न हो जाय? अनिर्वचनीय संस्कृति को निहारने वालों के बालपन में ही आयातित चश्मे लग रहे हैं। प्रत्येक आकृति अपने स्वार्थ कूप में गिरकर अपनी एकाकी नियति के गीत गा रही है।

गाँवों का भौतिकता की चपेट में आना और वहाँ भी शोषण, अन्याय, अत्याचार का वैश्विक रूप में पल्लवित होना अब गँवई संस्कृति का हिस्सा है। घरों में एक विक्षोभ, एक हीनताबोध भर रहा है। संस्कृतिक संक्रमण तथा अधकचरापन सब कुछ कुचले डाल रहा है। कुंठा, भय,संत्रास, उपेक्षा, स्वार्थ, अर्थ लिप्सा, भोग विलास में निपट अकेला मनुष्य। कभी हम विदेशी कपड़ों की होली जलाते थे।  पर अब तुम लूटो और हम ठसक बघारेंगे। भोजन उनके जैसा, पहनना ओढ़ना उधार का बोली-भाषा भिखमंगई की और संस्कार गिरवी रख दिये। अमीर-गरीब की खाई बढ़ी और बाजार-विकास की ताकत। लोक का सत्यानाश! हमने विकास का वही रास्ता चुना जो यूरोप-अमरीका का रास्ता है। हमने दो बातें नहीं सोची। एक तो यह कि यह रास्ता हमारे लिए खुला है या नहीं? दूसरा इस रास्ते पर चलने या उसकी कोशिश का परिणाम हमारे लिए, देश व समाज के लिए और हमारी भावी पीढ़ियों के लिए क्या होने वाला है? वित्तीय पूंजी आधारित व्यवस्था का फायदा पहले से मजबूत तत्वों को ही हो हुआ है। आर्थिक मंदी, भूख, बेरोजगारी और वैचारिक हिंसा में उलझती दुनिया निजी स्वार्थों के लिए अभिशप्त हो चली है। उसमें मंशा यह है कि पूरी दुनिया एक ही तरह की दिखे। आयातित कैक्टसों के गुलदस्तों से क्या वास्तु रचा जा रहा है! हमारे परम्परागत रीति-रिवाज सब बासी।

हुनर-कला को मजदूर बनना पड़ा और आज मजदूर को हम क्या-क्या बनते देख रहे हैं? हमने  जो नयी दुनिया रची है उसकी झांकी में जातिगत वैमनस्य, सामाजिक रूढ़िवादिता, वैचारिक पिछड़ेपन और धार्मिक संकीर्णता से ग्रस्त लाइलाज अत्याधुनिक समाज। यह मानने में कठिन लग सकता है कि मंगल ग्रह में ध्वजा फहराने वाले देश समाज में अभी भी सोपानीकृत व्यवस्था फल-फूल रही है। भोगोन्मुख संस्कृति को भकोसना और गरियाना एक साथ। लूट और छूट का  अर्थशास्त्र माँग और पूर्ति पर भारी पड़ रहा है। अंधा उपभोग आंतरिक जीवन को इतना रिक्त और बाह्य जीवन को इतना कलहपूर्ण बनाता है कि ज्ञानेंद्रियाँ गोठिल होकर काम करना बंद कर दे रही हैं।

यह समय हमारी पुरातनता के जागरण का है। आस्थाओं के सृजन का है। और सर्वोपरि यह कि साधारण से असाधारण के गृहण एवं बनावट-बुनावट के कपट रूप के परित्याग का है। नेतृत्व के लिए नैतिक साहस और मानवीय गरिमा के आह्वान का है। हमारे सामाजिक जुड़ाव की अंतर्निहित तार्किकता को भी पुष्ट करना होगा कि राष्ट्र हमेशा अपने नागरिकों के लिए तत्पर है। सकारात्मक पहल से असहमत होने में कोई हर्ज नहीं लेकिन ऐसे समय में लोगों को कम से कम नकारात्मक माहौल बनाने से तो बाज आना ही चाहिए। हम जानते हैं कि इतिहास में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है जो हमें अतीत की व्याख्या, वर्तमान का समाधान और भविष्य का आकलन करना सिखाता हो, पर हम इतनी उम्मीद तो कर सकते हैं कि कुछ दिन बाद दुनिया और बेहतर होगी। संयम के तप से क्या नहीं हो सकता? वक्त इम्तहान का है अंत का नहीं!