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वृद्धाश्रम- लघुकथा
November 22, 2019 • लता तेजेश्वर रेनुका

कुछ ही दिन पहले की बात है, हम एक वृद्धाश्रम गए थे। मैं, मेरी सहेली ममता, उसका पति राहुल और उनके बच्चे रोहन और ईशा। जैसे ही हम वहां पहुंचे, आश्रम की वार्डन ने आ कर हमारा स्वागत किया और बैठने के लिए कहा। हम रिसेप्शन में जा कर बैठ गये। थोड़ी देर बाद हमें ऑफिस में बुलाया गया। हमारे बैठने के बाद वृद्धाश्रम की संचालक अनुपमा जी ने हमसे पूछा, ''आपको यहां तक पहुँचने में दिक्कत तो नहीं हुई?''

हमने कहा, ''जी, नहीं।''

उन्होंने फिर कहा, ''बताइए, आप क्या चाहते हैं? आप माँ-बाप गोद लेना चाहते हैं?''

''जी आप गलत समझ रही हैं। हम किसी को गोद लेने नहीं आये हैं, हम किसी की गोद के लिए तड़प रहे हैं। हम चाहते हैं कोई हमें गोद ले।'' ममता ने कहा।

वार्डन ने हैरान हो कर पूछा, ''क्यों?''

वह कुछ और पूछती ममता की आँखें आंसुओं से भर गईं। अपनी आंखें पोंछते हुए उसने जवाब दिया, ''जी, हम पहले से ही अकेले हैं। हमारा छोटा सा एक परिवार है। हमारे बच्चे भी हैं। हमारे बच्चे बहुत बड़े नहीं है। हम कामकाजी लोग हैं। और इतना तो कमा लेते हैं कि हमारे परिवार को अच्छी से अच्छी परवरिश दे सकें। इसी सिलसिले में हमें अक्सर घर से बाहर रहना पड़ता है। बच्चे इस बात से बहुत परेशान रहते हैं। वे हमेशा हमें बहुत मिस करते हैं।'' अपने बच्चों के सिर पर हाथ फिराते हुए  फिर बोली, ''देखिए आप गलत न समझें कि हम अपने बच्चों की जिम्मेदारी किसी के कंधों पर डालने आये हैं। हम यहां इसलिए भी नहीं आये हैं कि कोई हमारे बाहर जाने के बाद हमारे बच्चों की देखभाल करे बल्कि हम यहां इसलिए आये हैं कि हमें बड़ों की सख्त जरूरत है।  सारा दिन हमारे घर से बाहर रहने के कारण हमारे बच्चे अकेले पड़ जाते हैं, साथ ही वे हमारी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। क्योंकि हमारे घर में कोई बुजुर्ग नहीं है। अच्छाई-बुराई को समझाने या उन्हें आशीर्वाद देने वाले हाथ नहीं हैं। बचपन में ही हमारे सिर से माँ-बाप का साया छिन गया था।''

तब राहुल ने कहा, ''देखिए, हम वादा करते हैं कि उनकी हर जरूरत को पूरी शिद्दत से पूरा करेंगे। हम ममता के भूखे हैं। हमें जो भी गोद लेगा, हम पूरी जिंदगी अपने माँ-बाप की तरह उनकी सेवा करेंगे। बस वे हमारे बुजुर्ग माँ-बाप की तरह हम पर हक जताएं और हमारे बच्चों की छोटी-बड़ी गलतियों को माफ करते हुए हमें सही रास्ता दिखाएं। हमारे बच्चों के सिर पर उनका आशीर्वाद का साया हमेशा बना रहे।''

कुछ देर चुप रहकर भावुक होते हुए राहुल ने फिर से कहा, ''हम बचपन से बिना माँ बाप के साये के जिंदगी बिताए हैं, उनसे दूर रह कर हमने अपना बचपन खो दिया है। लेकिन अब हम इतने लायक तो हैं कि उनकी हर जरूरत पूर्ण कर सकें और हमें माँ-बाप चाहिए। उनका प्यार आशीर्वाद चाहिए। हम चाहते हैं कोई हमें गोद ले ले हमें स्वीकार ले। बस इससे ज्यादा हमें कुछ नहीं चाहिए।'' उनकी आँखें नम हो गयी।

''देखिए, हमें मना मत कीजिए।'' ममता ने अनुपमा जी का हाथ पकड़ कर अनुनय करने लगी।

वार्डन अनुपमा आवाक रह गयी। अपने माँ-बाप को बोझ समझ कर यहां छोड़ कर जाने वाले तो देखे हैं लेकिन ये पहले ऐसे माँ-बाप हैं जो खुद के लिये माँ-बाप तलाश रहे हैं, उनके लिए तड़प रहे हैं। सच है जो आसानी से मिल जाए उसका मोल किसी को समझ में नहीं आता। बच्चों को माँ-बाप बिन मांगे ही मिल जाते हैं। बिन मांगे उनकी हर इच्छा पूरी हो जाती है। शायद यही कारण है जो बच्चे कुछ ही दिनों में माँ- बाप से खिन्न हो जाते हैं और उनसे पीछा छुड़ा कर आजाद होना चाहते हैं। परन्तु जिन्हें यह प्यार और ममता नहीं मिली, वही जानते हैं कि उस प्यार की कीमत क्या है? अनुपमा की आंखों में आंसू आ गये। उसने बच्चों की तरफ देखा।

ईशा ने मासूम नजरों से पूछा, ''आप हमें दादा-दादी देंगे न? ''

तब रोहन ने कहा, ''आंटी, मेरे सारे दोस्तों के दादा-दादी हैं जो उन्हें रोज नई कहानी सुनाते हैं। थपकी देकर सुलाते हैं लेकिन हमें कोई कहानी नहीं सुनाता। हमारे दादा दादी नहीं है न इसलिए।'' उसने आशा से देखते हुए कहा।

अनुपमा ने कुर्सी से उठ कर आगे बढ़ते हुए कहा, ''काश की सब बच्चे माँ बाप के प्यार को आप जैसा समझ पाते तो शायद आज इन वृद्धाश्रम की जरूरत ही नहीं होती। चलिए आपको सब से मिलवाती हूँ।''

मैं बस देखते ही रह गयी।